भारतीय लोककला में साँझी का महत्व…

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लोक कलाओं की सहज अभिव्यक्ति भी कला को एक मूल प्रवित्ति सिद्ध करती है फिर यह प्रमाणित हो गया है कि किसी समाजिक, संगठित व्यवस्था में ही कला विकास के नए आयाम स्थापित कर सकती है। 

लोककला दो शब्दों का मिश्रित रूप है। जहां ‘लोक’ का प्रयोग सम्पूर्ण जनसमुदाय के लिए किया जाता है जो संगठित होकर कार्य करते हैं। और ‘कला’ कल्पनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने की क्रिया है। शेली के शब्दों में ‘कला कल्पना की अभिव्यक्ति है।’ अर्थात संगठित जनसमूह द्वारा अपनी कल्पनाओं को आकार देने की क्रिया लोककला कहलाती है

प्रत्येक लोककला की व्युत्पत्ति लोक समाज में ही होती है। लोक समाज से उठने वाली भावनाओं, कल्पनाओं एवं विचारधाराओं का प्रकटीकरण जिन स्वरूपों में होता है। उन्हें लोक चित्र के परिवेश में बांधा जा सकता है। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार “लोक शब्द का अर्थ ग्राम या जनपद नहीं है वरन् नगरों तथा ग्रामों में फैली हुई वह समुचिक जनता है जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं।”



इन सभी लोककलाओं में कला संस्कृति की प्रतीक साँझी कला का स्थान हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसी लोककला है जो सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने क्रियाविधि से बनाई जाती है। 

साँझी ब्रज की कुमारियों का एक लोकप्रिय पर्व है। जो भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या मनाया जाता है। सोलह दिन तक बनने वाले भित्ति चित्र साँझी और कुमारियों के कोमल कंठो से फूटते सारगर्भित भावपूर्ण गीतों का समागम सम्पूर्ण ब्रज के गांव, कस्बों एवं शहरों को रंगो एवं राग से भर देता है। 

साँझी शब्द का जन्म संस्कृत के तत्सम शब्द ‘संध्या’ के तद्भव रूप से हुआ है। संध्या, गोधूलि की वह बेला जब गायें वापिस लौटती हैं। भारतीय ग्रन्थों में इसे अत्यंत पवित्र समय की मान्यता दी गयी है। साँझी की रचना भले ही पूरे दिन चलती हो पर उसकी आरती संध्या को ही होती है। साँझी का एक अन्य अर्थ सज्जा, श्रृंगार या सजावट भी होता है। 

यह कुंवारी कन्याओं का अनुष्ठानिक व्रत है। अश्विन मास की प्रतिपदा से कुंवारी कन्याएं इस व्रत का आरम्भ करती हैं जो सम्पूर्ण पितृपक्ष में सोलह दिनों तक चलता है। नित दिन प्रातः गृह ड्योढ़ी की दीवार पर या काठ के स्वच्छ पटिये पर गोबर से लीप कर तैयार की जाती है। 

राधारानी गोपियों के साथ मिलकर स्वयं साँझी चित्रकारी करती थी। उन्होंने ही इसकी शुरुआत भी की थी। वे वन-उपवन विहार कर चित्रकारी के लिए रंग बिरंगे पुष्प एकत्रित करती थी। जिससे रूष्ट श्रीकृष्ण हो मनाया जा सके। 

ब्रज की सांझीकला भारतीय चित्रकला के क्षेत्र में अपना विशेष स्थान रखती है। वस्तुतः यह ब्रज की एक लोक चित्रकला है, जो प्रायः वैदिक काल से यज्ञ में ॠषि- पत्नियाँ और ॠषि- कुमार यज्ञ मंडप सजाने के लिए बनाते थे, परंतु भगवान श्री कृष्ण के काल से इसका विशेष लौकिक रूप सामने आया। 

ब्रजभूमि प्राचीनकाल से ब्रह्मर्षि यज्ञभूमि रही है। यज्ञों में वैदिक कर्मकांडी लोग अपने यज्ञ मंडपों को और विशेष कर यज्ञ कुंडों के चारों ओर हरिद्रा ( हल्दी ), कुमकुम, आटे से तथा अन्य रंगीन चूणा से कमल, स्वास्तिक बेलबूटे, लता आदि मांगलिक चिह्म बनाकर कला प्रदर्शित करते थे।

आज जिसे रांगोली भी कहते हैं। अतएव सूखे रंग की यह कला वैदिक काल से ही प्रचलित है। साँझी केवल हाथ की कला कुशलता ही नहीं दिखलाती, बल्कि इसके बनाने में भूमिति का ज्ञान और प्रकृति के सहवास के ज्ञान तथा अनुभव की भी आवश्यकता होती है।

ब्रज की अविवाहित कन्याएँ साँझी में गाय के गोबर एवं पुष्पों से भित्ति चित्रकारी करते हैं। वह यह चित्रकारी देवी के सम्मान में उन्हें मूर्त रूप प्रदान करने के लिए एवं सुयोग्य वर की अभिलाषा में करती हैं। गाय के गोबर और पुष्प का प्रयोग ब्रज के लोककलाओं में प्राचीन समय से चला आ रहा है।



श्री हरिदास भी अपनी पंक्ति में इसका उल्लेख करते हैं : 
“कामधेनु के गोबर सो रचि साँझी फूलन चिति”

आज इस सुंदर कला को बनाने वाले कुछ ही लोग शेष रह गए हैं। इसकी छटा वल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों में या विशेष उत्सवों में आज भी मथुरा एवं वृंदावन के देवालयों में परिलक्षित होती है। 
भारतीय लोककलाओं में प्राकृतिक वस्तुओं का बहुत प्रयोग होता है।

गाय का गोबर, दूध, पुष्प इत्यादि। हमारी परंपरा में प्रकृति न्यस्त है। हम जो उससे ग्रहण करते हैं वही उसे लौटाने की चाहना भी रखते हैं। यह देह भी पञ्च तत्वों से निर्मित होती है और पुनः उसी में विलीन हो जाती है। हमारे पर्व एक वृत्ताकार परिधि पर घूमते रहते हैं। जो जैसे जाते हैं वैसे ही हम तक लौट आते हैं। 


त्वदीयं वस्तु गोविन्द: तुभ्यमेव समर्पये

किसी भी समाज की पहचान उसके विकास से पूर्व उसकी विशुद्ध संस्कृति से होती है। यदि हम अपनी लोक कलाओं को संरक्षित नहीं कर पाएंगे तो भारतीय होने ही पहचान क्या रह जायेगी हमारे पास? तीज-त्योहारों को नष्ट करने से विकास हो यह एक सांस्कृतिक समाज के लिये न्यायोचित नहीं लगता।  

संसार में देशभेद के अनेक प्रकार के मनुष्य हैं। उनकी संस्कृतियां भी अनेक हैं। यहां नानात्व अनिवार्य है, वह मानवीय जीवन का संकट नहीं अपितु उसकी सजावट है। किन्तु देश एवं काल की सीमा में बंधे हुए हमारा घनिष्ट परिचय या सम्बंध किसी एक संस्कृति से ही सम्भव है।

वही हमारी आत्मा एवं मन में रमी हुई है जो हमारा संस्कार करती है। यों तो संसार में अनेक स्त्रियाँ एवं पुरुष हैं पर एक जन्म में जो हमारे माता पिता बनते हैं उन्हीं के गुण हममें आते हैं और उन्हें ही हम अपनाते हैं। ऐसे ही संस्कृति का सम्बंध है वह सच्चे अर्थों में। हमारी धात्री होती है। 

फ़ोटो साभार: गूगल

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