नए रूप का राष्ट्रवाद,जिसने अपनी राष्ट्रीय हितों को पूर्ण करने के लिए एक औपनिवेशिक व्यवस्था में तब्दील कर दिया

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सोलहवीं सदी के आसपास यूरोपिय महाशक्तियां आधुनिकता के नये पृभात में पृवेश कर रही थी,जहाँ जीवन के हर आयाम में नये उच्च आदर्शों के समावेश को बल दिया गया |

सामंती व्यवस्था से इतर समानता ,नैसर्गिक न्याय आदि उच्च आदर्शों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं जन्म ले चुकी थी,आर्थिक क्षेत्र में आधुनिक मशीनों के आविष्कार और उनके उपयोग जिससे मानव समाज को कष्ट दायक,मार्मिक श्रम से मुक्ति मिली अर्थात शिल्प से औधौगिक स्तर का विकास हुआ |

नये रूप का राष्ट्रवाद,एक अलग तरह के राष्ट्रीय गौरव की चेतना जिसने अपनी राष्ट्रीय हितों को पूर्ण करने के लिए लगभग शेष विश्व को एक औपनिवेशिक व्यवस्था में तब्दील कर दिया,सोलहवीं सदी में यूरोपीयो की राष्ट्रीय चेतना का यह स्वरूप,सामाजिक क्षेत्र में आये अन्य पृगतिशील बदलाव बेहद रोमांचक है जिन्होंने उन्हें आगे आने वाले समय के लिए सदैव के लिए सर्वोच्च बना दिया|

एक ही राष्ट्रीयता के भीतर संघर्ष पैदा हुए लेकिन उच्चतर श्रेष्ट व्यवस्था व मूल्यों के लिए अविवादित विश्व शक्ति अमेरिका का जन्म एवं अशि्तत्व में आना ऐसा ही सकारात्मक विकास है |

हम कथित भारतीय मुख्यत: अपनी प्राचीनता पर गर्व करते हैं,होना भी चाहिए| जहाँ समय का लम्बा सातत्व किसी भी समाज की विशिष्टता हैं लेकिन जीवन व समाज में गुणातम्कता के आयाम का कदोचित विश्लेषण एवं समाज को श्रेष्टता की ओर ले जाने के लिए सकारत्मक परिवर्तनों के लिए किए गये पृयास कही अघिक महत्वपूर्ण है कुछ प्राचीन भव्य स्थापत्य के अदि्वतीय उदाहरण हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं |

लेकिन उनके निर्माण में लगे मानव श्रम के स्वरूप को समझना,निर्माण में विज्ञान पृऔधोगिकी के इस्तेमाल को समझना अति महत्वपूर्ण हैं |

हम इनकी भव्यता पर तभी गर्व महसूस हो सकता है जब भव्यता के ही अनुपात में न पृऔधोगिकी का पृयोग हुआ हो,नहीं तो यह सांस्कृतिक विकास में मानवीय शोषण,अमानवीय श्रम के ही पर्याय होंगे चाहे वो कोई मंदिर हो या ताजमहल |

सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के यूरोपीय देशों के राष्ट्रीय मूल्यों का मन मस्तिष्क में आना सहज है,लोगों को इसे जानना पढ़ना चाहिए राष्ट्रवाद,राष्ट्र प्रेम आजकल की टीवी बहसों में न ढूंढे त्याग,बलिदान, मानव जाति के पृति अदि्वतीय प्रेम एवं पारस्परिक सम्मान,हित की भावना चेतना इसका मूल हैं |

लेखक–लालमणी सिंह

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