त्रिभंगी शालभंजिकाएं…

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कुछ प्रतिमाएँ अपनी ओर इतने उत्कट वेग से विमोहित करती हैं कि उनका दैवीय बिम्ब स्मृति-पटल पर जन्मों तक के लिए स्थापित हो जाता है। त्रिभंगी शालभंजिकाओं की प्रतिमाएं मेरे लिए वही आकर्षण का केंद्रबिन्दु हैं। स्त्री-भाव के नित नए आयाम रचती हुई प्रतिमाएँ। यदि उन्हें ना देख पाता तो शायद उन पूर्वजों से अनभिज्ञ रह जाता जिन्होंने पाषाण की कठोरता को भी भावात्मक लावण्यता से भर दिया। 

सनातन संस्कति में आरम्भ से वृक्षों का महत्व रहा है। वनस्पतियों, वृक्षों एवं वनदेवता की पूजा का प्रचलन रहा है। गीता में भगवान श्री कृष्ण भी अर्जुन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन ! मैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ वृक्ष हूँ परिमाण और आयुमर्यादा दोनों की दृष्टि से अश्वत्थ। क्योंकि वह प्राय कई शताब्दियों तक जीवित रहता है। हिन्दू लोग उसकी पूजा करते हैं। उसके साथ दिव्यता और पवित्रता की भावना जुड़ी हुई है। वैदिक परम्परा से परिचित लोगों को अश्वत्थ शब्द उपनिषदों में वर्णित संसार वृक्ष के रूपक का स्मरण भी कराता है।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।।10.26।।
कालिदास साहित्य में भी प्राकृतिक पर्यावरण मूक, अचेतन एवं निष्प्राण नहीं है। वे भी मानव पात्रों की भांति सुख-दुःख, आनन्द-उल्लास एवं संवेदना आदि मनोविकारों का अनुभव करते हैं। उनकी लताएं एवं वृक्ष रोते हैं, आंसू बहाते हैं। भेंट एवं उपहार समर्पित करते हैं। कुशल क्षेम पूछते हैं। पथिक को अपने गंतव्य तक जाने की अनुमति प्रदान करते हैं। कालिदास का प्राकृतिक पर्यावरण “वनवासबन्धु” के रूप में संवेदनशील है। 

प्रथम नाटक “मालविकाग्निमित्रम्” का शुभारंभ बसंतोत्सव में अभिनय की उमंग से होता है। इस नाटक में महाकवि ने बतलाया है कि प्राकृतिक पर्यावरण मानवीय सौंदर्य का पूरक एवं तुलनात्मक तत्व है। 

अभिज्ञानशाकुंतलम् एक भाग में महाकवि ने दर्शाया है कि शकुन्तला के विदाई के अवसर पर आश्रम के सभी व्यक्ति दुःखी हैं। वृक्ष एवं वनदेवता भी पीड़ा से विरक्त नहीं हैं। वे उपहार स्वरूप वस्त्र, अलक्तक (महावर) एवं आभूषण देकर शकुन्तला के प्रति अपना अनुराग प्रकट करते हैं ।  
महाकवि कालिदास की मान्यता है कि मनुष्य जब प्राकृतिक पर्यावरण से पृथक जो जाता है तो यह समझ लेना चाहिए कि उसकी अंतश्चेतना मंथर हो चुकी है। उसके भीतर की आध्यत्मिक भूख कालकवलित हो चुकी है और उसमें समाज कल्याण की भावना सूख चुकी है। 

वृक्षाणां चेतन्त्वम् में महर्षि भृगु एवं महर्षि भारद्वाज के मध्य हुए संवाद में भृगु यह सिद्ध करते हैं कि वृक्षों में भी अन्य प्राणियों के समान चेतना होती है। आगे चलकर भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सिद्ध किया कि पौधों में जीवन होता है वह भी हमारी तरह भोजन का निर्माण करते हैं, सांस लेते हैं। उनमें भी संवेदनाएं हैं। 

वृक्षों एवं स्त्रियों के मध्य सम्बन्ध प्राचीन काल से रहा है। महाभारत के भीष्मपर्व में स्त्रियां शिशु की अभिलाषा में वृक्षदेवी की पूजा करती थी। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं वंशवृद्धि की इच्छा पूर्ति के लिए साल (शाल) वृक्ष की आराधना करती हैं। दक्षिण में महिलाएं मन्नत पूर्ण होने के लिए वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं एवं उसपर धागा बांधती हैं। 

शालभंजिका का संस्कृत में अर्थ है “साल वृक्ष की डाल को तोड़ती हुई”। शालभंजिका को “स्त्रियों के उद्यान क्रीडा” के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। कुमारी, अविवाहित कन्याएँ जब साल या अशोक के वृक्ष की डाल झकझोरती थी तो उनके पुष्प झरने लगते थे और वे उन्हें बटोर लिया करती थी। स्त्रियां वृक्ष की डाल झुकाकर उनके पुष्प तोड़कर एक-दूसरे के ऊपर फेंकती थी।

बौद्ध साहित्य में शालभंजिका को श्रावस्ती के एक वृहद उत्सव के रूप में परिभाषित किया गया है।  
हमें प्रत्येक काल में दृश्य कला के अद्भुत उदाहरण देखने को मिलते हैं। ठीक उसी प्रकार बदलते समय के साथ शालभंजिकाओं के रूप-स्वरूप एवं मुद्राओं में भी विविधता परिलक्षित होती रही है। उत्तर भारतीय मूर्तिकला में निर्मित प्रतिमाएँ भावप्रवण हैं। जो त्रिभंगी मुद्रा में वृक्ष की डाल को पकड़कर खड़ी दिखाई पड़ती हैं।

शालभंजिकाओं को साल या अशोक वृक्ष के साथ निर्मित किया जाता था। उस समय की यह धारणा थी कि महिलाओं द्वारा इन वृक्षों की पूजा करने से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है। बंगाल में महिलाएं मार्च-अप्रैल माह में अशोक के कोपल का सेवन करती थी।

अशोक दोहदा नामक पर्व का भी उल्लेख मिलता है। दोहदा का अर्थ होता है गर्भवती होने की अभिलाषा रखना। इस समय वृक्ष स्त्रियों के स्पर्श की लालसा रखते थे। ऐसा माना जाता था कि स्त्रियों के स्पर्श से वृक्षों से नूतन कोपल प्रस्फुटित होंगी। वृक्ष की डालियां फलों से लद जाएंगी। 
जगदीश चन्द्र बोस ने भी अपने शोध में यह बतलाया था कि वृक्ष मधुर सङ्गीत की उपस्थिति में शीघ्रता से विकास करते हैं। 

भरहुत एवं साँची में जो स्त्री-भाव को प्रदर्शित करती मूर्तियां हैं उन्हें शालभंजिका नहीं कहा जाता था। वह यक्ष एवं यक्षिणी कहलाती थी। कुषाण वंश सम्राट कनिष्क के राजकवि अश्वघोष बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। इनकी रचनाओं पर बौद्ध धर्म एवम् गौतम बुद्ध के उपदेशों का पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है। 

जे. पी. वोगेल के अनुसार वह अश्वघोष थे जिन्होंने सर्वप्रथम  बुद्धचरितम् में “तोरण शालभंजिका” शब्द का प्रयोग वास्तु-काला-संबंध में किया। तोरण इसलिए क्योंकि शालभंजिकाओं का निर्माण मन्दिर या मंच के तोरण द्वार पर ही होता था। 

होयसल साम्राज्य में बनी शालभंजिकाओं या मदनिकाओं पर भावप्रवणता के साथ-साथ आभूषणों के अलंकरण पर भी अद्भुत कार्य किया गया है। उन्हें देखकर विस्मित मन के लिए यह कल्पना कर पाना जटिल हो जाता है कि ये मूर्तियाँ आज से ९०० वर्ष पूर्व बनी थी। होयसल साम्राज्य के समय बनी मदनिकाएँ भारतीय वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।

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