तीर्थस्थल एवं तीर्थगमन…

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जीवन के तीर्थगमन में जन्म एवं मृत्य के मध्य कई स्थान आते हैं। भारतवर्ष में मृत्यु उस तीर्थगमन का मात्र एक सूक्ष्म-सा पड़ाव है। उसे तीर्थगमन का अंत नहीं माना जाता है। मृत्यु मोक्ष का सत्य नहीं है। मोक्ष का अर्थ है अस्तित्व के प्रत्येक रूप स्वरूप से सम्पूर्णत: मुक्त होना। हर उस बंधन से जो हमारे मन हमारी आत्मा को भैतिक, आत्मिक एवं सामाजिक रूप से बांधे हुए है।

उससे निर्बन्ध होना न्यायोचित भी है और आवश्यक भी। सारे बंधनों से मुक्त होने के लिए हमें स्वयं के ज्ञान को जानना होगा। वह जो पुस्तकों में न्यस्त नहीं, हमारे भीतर है। ज्ञान का वह पुंज जो कालकवलित होने ही स्थिति में पहुँच चुका है। उसे अपने भीतर पुनः प्रज्ज्वलित करने की आवश्यकता है। 

बृहदारण्यकोपनिषद् में रचित पवमान मंत्र की पंक्ति ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ हमें यही संदेश देती है। मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताःतपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।कालो न यातो वयमेव याताःतृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥

वैराग्यशतकम् भर्तृहरि कहते हैं हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं।

ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा में लिप्त देह जीर्ण हो जाती है। लेकिन आत्मा का प्रकाश अनवरत बढ़ता रहता है। कुछ साधक जीवन के भीतर ही मृत्यु का सत्य खोज लेते हैं कुछ मृत्यु के पश्चात भी विचरते रहते हैं। 

तीर्थगमन एक युक्ति है जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं की देह, मस्तिष्क और अपनी मनःचेतना पर नियंत्रण पा लेता है, या पाने का प्रयास करता रहता है। तीर्थ मनुष्य के भीतर दैवीय आनंद अर्थात ‘भक्ति’ भावना को जागृत करती है और उसे मोक्ष के द्वार तक लेकर जाती है। तीर्थस्थल सम्पूर्ण भारत में बंटे हुए हैं। जिन्हें तीर्थ एवं क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ के अनुसार भारत में ऐसे सैकड़ों तीर्थस्थल हैं जहाँ लाखों की संख्या में तीर्थयात्री यात्रा करते हैं। 

समान्यतः तीर्थस्थल नदी एवं झील के किनारे स्थित होते हैं। तीर्थ वह स्थान है जो हमें सम्पूर्ण शुद्धि की ओर अग्रसर करने की शक्ति प्रदान करता है। ‘जल’ का कार्य मात्र कण्ठ की तृष्णा को शान्त करना नहीं होता है। जल प्रतीक है शुद्धि का, निरंतरता का एवं आंतरिक ऊर्जा के प्रस्फुटन का। गङ्गा, यमुना, कावेरी जैसी नदियां जिन्हें भारतवर्ष में माता का दर्जा प्राप्त है।

वहां मनुष्य इसीलिये जाता है कि उन नदियों में देवियां वास करती हैं। वह हमारी पीड़ाएँ, हमारा प्रायश्चित सब कुछ हर लेती हैं। और निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करती हैं। 

तीर्थस्थल तक जाने से पूर्व हमें नदियों से होकर ही जाना पड़ता है। किन्तु तीर्थस्थल ज्ञान के दीपक का अंतिम पड़ाव नहीं जहाँ हमें रुकना पड़ता है। वह तो ज्ञान का केंद्र बिंदु है जहाँ से स्वयं के सत्य को खोजने की यात्रा आरम्भ होती है। ‘क्षेत्र’ वह पवित्र स्थान होता है जहाँ देह और आत्मा की सम्पूर्ण सक्रिय ऊर्जा मुक्त होती है। 

गरुण पुराण के अनुसार भारत में 7 मुख्य तीर्थस्थल हैं जहाँ लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, द्वारिकापुरी। सप्तपुरी श्लोक में भी इन्हीं स्थानों का वर्णन है 

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
तीर्थ के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही जाती है वह यह है कि प्रत्येक तीर्थयात्री को एक स्नान अवश्य करना चाहिए। वह है ‘मन का स्नान’ अर्थात मन:स्थिरता का स्नान।

जो अन्य किसी भी स्नान से गह्वर है, स्वच्छ है और पवित्र है।  जो इस स्नान में सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं वह किसी भी वस्तु के सत्य से परिचित हो जाते हैं। जिसे तत्वदर्शन कहा जाता है। 

तीर्थ वहीं बनाये जाते हैं जहां हमारे ईश्वर मनो विनोद कर सकें। जहां नदियाँ हों, झील हों, सूर्योदय की किरण उनके कर कमलों तक पहुँचे। जहाँ कोपलों से कमल खिल रहे हों, हंस प्रसन्नचित कलरव कर रहे हों। जहाँ विहग ईश्वर के स्वागत में गीत गा रहे हों। जहां प्रत्येक जीव नदी किनारे ईश्वर के दर्शन के लिए एकत्रित हुए हों। 

ईश्वर वहीं खेलते हैं जहाँ वृक्ष नदियों, पर्वतों और बसन्त के निकट हों और कस्बों में जहाँ आमोद प्रमोद से परिपूर्ण उद्यान हों। ऐसे स्थान ही ईश्वर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। (भरत संहिता)


चित्र : बनारस 

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