कश्मीर के मार्तण्ड सूर्य मंदिर का गौरवशाली इतिहास…

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सूरज सरस्वती शाण्डिल्य
बनारस


 
“हे मार्तण्ड के सूर्य अब उदय की बेला है “

कश्मीर के दक्षिणी भाग में अनंतनाग से पहलगाम के रास्ते में पड़ता है मार्तण्ड। ‘मार्तण्ड का अर्थ है सूर्य’। कार्कोट वंश का सूर्य। मन्दिर का निर्माण कार्कोट वंश के तृतीय राजा ललितादित्य ने (725-756) के मध्य कराया था। भारत के विशाल मन्दिरों में से एक था मार्तण्ड सूर्य मंदिर। मानो अनंतनाग के पर्वत पर देदीप्यमान दीपक हो कार्कोट वंश का। 


ललितादित्य की अभिलाषा थी कि मार्तण्ड सूर्य मंदिर का आलोक अनन्तकाल तक सांसारिक नेत्रों को अचंभित करता रहे। यही कारण है कि ऐसे वास्तुकला का उदाहरण सम्पूर्ण भारत में मिलना असम्भव है। 
मन्दिर के निर्माण में कश्मीरी वास्तुकला के साथ-साथ रोमन बाइजेंटाइन वास्तुकला का प्रभाव भी दिखाई देता है। मन्दिर के स्तम्भों पर, द्वारों पर। पत्थरों पर नक्काशी कर ईश्वरीय मूर्तियों का निर्माण किया गया। कश्मीरी वास्तुकारों ने मूर्तियों के निर्माण में कुछ संशोधन भी कियें ताकि मूर्तियां शीत ऋतु में निकृष्ट ना हों। 

ग्रीक प्रभाव मार्तण्ड सूर्य मंदिर एवं अवन्तिपुर के वास्तुकला पर देखने को मिलता है। कहा जाता है कि रोमन गांधार के मार्ग से कश्मीर आये थे। मन्दिर को एक लंबी अवधि तक कई राजाओं का संरक्षण प्राप्त रहा। जिसके फलस्वरूप मन्दिर के सौंदर्यीकरण एवं पूजा अर्चना में वृद्धि होती चली गयी। 

मंदिर स्तंभों और मेहराबों के आंगन में घिरा हुआ है, जो चारों तरफ से ढका हुआ है। मन्दिर का आंगन 220 फुट x 142 फुट है। यह मंदिर 60 फुट लम्बा और 38 फुट चौड़ा था। इसके चतुर्दिक लगभग 80 प्रकोष्ठों के अवशेष वर्तमान में हैं। इस मंदिर के पूर्वी किनारे पर मुख्य प्रवेश द्वार का मंडप है। इसके द्वारों पर त्रिपार्श्वित चाप (मेहराब) थे, जो इस मंदिर की वास्तुकला की विशेषता है। 

सूर्य की प्रथम किरण के क्षेत्र में पड़ते ही पूजा आरम्भ हो जाती है। मन्दिर का निर्माण जिस काल में हुआ उस समय प्रतिमाओं से अधिक प्राकृतिक संसाधनों की पूजा पर बल दिया जाता था। सूर्य, चन्द्रमाँ, अग्नि, जल, वनस्पति आदि को ईश्वर का स्वरूप माना जाता था। और उन्हीं की पूजा की जाती थी। मार्तण्ड सूर्य की आराधना “ऊर्जा के स्त्रोत” के रूप में की जाती थी। 

भारत में चार प्रमुख सूर्य मंदिर हैं। उड़ीसा, गुजरात, राजस्थान एवं कश्मीर में। उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर, गुजरात के मेहसाणा का मोढेरा सूर्य मंदिर, राजस्थान के झालरापाटन का सूर्य मंदिर और कश्मीर का मार्तंड मंदिर। उड़ीसा, गुजरात एवं राजस्थान के सूर्य मंदिर तो फिर भी बेहतर स्थिति में हैं किन्तु अनंतनाग का सूर्य तो ढल चुका है। 

हर स्वर्ग को किसी ना किसी की कुदृष्टि अवश्य लील जाती है। कश्मीर के साथ भी यही हुआ। धरती के स्वर्ग को तब नज़र लग गयी जब सिकन्दर शाह मीर कश्मीर की गद्दी पर बैठा। उसने शासन व्यवस्था संभालते ही हिंदुओं को प्रताड़ित करना आरंभ कर दिया। इसमें उसकी सहायता की 1397 में आये इस्लामी धर्मगुरु मीर मोहम्मद हमदानी ने। उसकी हिन्दू विरोधी नीतियों ने सम्पूर्ण कश्मीर को उजाड़कर रख दिया। 

सिकंदर बुतशिकन ने हिंदुओं के सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दियें क्योंकि शरिया कानून के अनुसार नृत्य, गायन जैसी कलाएं कुफ़्र हैं। पुजारियों के तिलक लगाने, जनेऊ पहनने और मन्दिर में घण्टी बजाने पर भी रोक लगा दी गयी।

हिंदुओ को शव जलाने की अनुमति नहीं थी उन्हें दफ़नाने के लिए बाध्य किया जाता था। हिंदुओं पर जज़िया कर लगाया गया जिसके अनुसार प्रत्येक हिन्दू (यदि परिवार में 4 सदस्य हैं तो चारों से) 4 तोले चांदी हर वर्ष ली जाती थी। हिन्दुओं के तीर्थ यात्रा पर रोक लगा दी गयी। 
जज़िया कर के इतर हिंदुओं के मरने पर, पैदा होने पर और दावत देने पर भी कर लगाए गए। जिसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में कश्मीरी पलायन कर गयें और लगभग 7 लाख हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया गया। 

मु‍स्लिम इतिहासकार हसन ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में कश्मीरी जनता का धर्मांतरण किए जाने का जिक्र इस तरह किया है, ‘सुल्तान बुतशिकन (सन् 1393) ने पंडितों को सबसे ज्यादा दबाया। उसने 3 खिर्बार (7 मन) जनेऊ को इकट्ठा किया था जिसका मतलब है कि इतने पंडितों ने धर्म परिवर्तन कर लिया।’

सिकन्दर को सिकन्दर “बुतशिकन” या “कश्मीर का कसाई” जैसे नाम से भी जानते हैं। बुतशिकन अर्थात मूर्तियों को तोड़ने वाला। सिकंदर ने अपने कार्यकाल में कश्मीर के कई प्रसिद्ध हिन्दू तथा बौद्ध मन्दिरों को नष्ट किया था। इसने अपने शासनकाल में क्रूरता की सभी हदें पार कर दी थी। मार्तण्ड सूर्य मंदिर को ध्वस्त करने के पश्चात भी जब इसकी आत्मा तृप्त नहीं हुई तो इसने कश्मीर के जंगलों को कटवाकर वहां की लकड़ियों ने मन्दिर को ढककर आग के हवाले कर दिया। 

फ्रैंकोइस गोटीएर अपनी पुस्तक “री राइटिंग इंडियन हिस्ट्री” में लिखते हैं – ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा किया गया नरसंहार नाज़ियों द्वारा मारे गए यहूदियों और तुर्कियों द्वारा मारे गए आर्मेनियन्स से बहुत बड़ा था। यहां तक कि स्पेनिश और पुर्तगाली लोगों द्वारा किये गए अमेरिकी नरसंहार से भी विभत्स। 

किसी दिन लिखा था ‘हम ध्वस्त हुई संस्कृति के उपासक हैं। हमें उनके साथ ही रहने दीजिए।’ हो सकता है आने वाला सूर्य आज के सूर्य से अधिक ऊर्जावान हो। कश्मीर पुनः धरती का स्वर्ग बनें। मार्तण्ड की घण्टियाँ पुनः सूर्य देव की उपासना में बजने लगें। हिन्दू तिलक लगा सकें, जनेऊ पहन सकें। हर्षोल्लास से अपने त्योहार मना सकें। 


“आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्”‌ । 

*मार्तण्ड सूर्य मंदिर की तस्वीर 1868, जॉन बुर्के

नोट: इस लेख में प्रकाशित किए गए लेखक के निजी विचार हैं I 

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