“आम जन का निजीकरण समर्थन करना”, असल में उस डाल को काटने जैसा जिस पर स्वयं बैठे हो

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एक मूल तथ्य है जो कम या बिना पढ़े-लिखे व्यक्ति को भी पता होता है (पता होना चाहिए) कि एक चुनी हुई सरकार और उसकी संस्थाओं का मूल दर्शन “कल्याण” है और बाकी सभी तंत्रों का मूल दर्शन “अवसरवादी मुनाफाखोरी” है। इस तरह निजीकरण से मध्यवर्ग व तनख्वाहजीवियों को अथक कठिनाइयों और गरीब व अतिगरीब को अस्तित्व के संकट का सामना करना होगा, आज नहीं तो कल।

ऐसे में निजीकरण को एक मात्र विकल्प मानना बुद्धि की जड़ता की निशानी है क्योंकि बेहतर करने के विकल्प किसी भी समय सीमित हो जाते हैं।

फिर हमारे सामने तो एक उदाहरण है कि मात्र 4 वर्षों में देश के सबसे पुराने, सबसे बड़े, सर्वाधिक रुग्ण और असाध्य माने जा चुके सार्वजनिक उपक्रम भारतीय रेलवे को एक कम पढ़े-लिखे मसखरे व्यक्ति के रूप में विख्यात रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने 25000 करोड़ रु के मुनाफे में ला दिया था वो भी यात्री किराया और माल भाड़ा बढ़ाए बगैर।

इस पर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में व्याख्यान भी आयोजित किये गए और इसे case study के रूप में पढ़ाया भी गया। यहाँ तक कि अभी भी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में लालू प्रसाद यादव को पढ़ा और पढ़ाया जा रहा है।

लेकिन अपने देश में उन्हें भुला दिया गया क्योंकि हम इलाज करने के बजाए अंग काट देने या सुधार करने के बजाय औने-पौने दामों में बेच देने के दर्शन में यकीन करने लगे हैं। Comptroller and Auditor General (CAG)-2011 Report में रेलवे को लाभ में लाने को “Cosmetic Exercise”, “Rosy Picture” या “much inflated balloon of claims” कहा गया। यहां यह जानना जरूरी है कि इन्हीं CAG ने 2012 की रिपोर्ट में 2G Spectrum घोटाला और Coal Gate scam उजागर किया था।

2G Spectrum घोटाले को उच्चतम न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया और कोल् गेट घोटाले में शामिल जाँच अधिकारीयों के स्थानांतरण पर Dec 2020 में अपना रोष जताया व Feb 2020 में सीबीआई को केस की नई status report दाखिल करने के लिए 4 हफ्ते का समय दिया गया |

जिसके बाद से COVID-19 से देश-दुनिया लड़ रही है।

हमें यह भी समझना चाहिये कि अगर यह स्थापित किया गया है कि लालूप्रसाद ने आंकड़ों मे कीमियागिरी करके घाटे को लाभ में परिवर्तित कर प्रस्तुत कर दिया तो इसी के साथ यह तथ्य स्वतः स्थापित हो जाता है कि आंकड़ों के साथ हेर फेर कर या उन्हें पुनर्परिभाषित कर लाभ को घाटे के रूप में भी दिखाया जा सकता है जो कि बेचो-खाओ-उड़ाओ वाली मानसिकता सदियों से करते आ रही है।

हममें से लगभग सभी ने कभी न कभी, कहीं न कहीं देखा या सुना होगा कि किस तरह एक अमीर व्यक्ति ने अपनी पूरी जायदाद बेंच कर विलाशिता में उड़ा दी और अब जब कुछ नहीं बचा तो उधार पर गरीबी में जिन्दगी चल रही है।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि “इलाज करने के बजाए अंग काट देने या सुधार करने के बजाय औने-पौने दामों में बेच देने के दर्शन” में यकीन रखने वाले लोग तो अनथक अपने propaganda को आगे बढ़ाते रहेंगे। लालू प्रसाद का जिक्र आते ही उनके उनकी बुराइओं को बढ़ा-चढ़ा कर सामने रखा जाएगा ताकि लोग उनके द्वारा प्रस्तुत इस अपनी तरह के एकमात्र उदहारण से भटक जाएँ और उनका बेचने का एजेंडा अनवरत चलता रहे।

ऐसे में जो आम जन निजीकरण समर्थन कर रहे हैं वे असल में उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर वो बैठे हैं और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी वहीं बैठेंगी। आने वाली पीढ़ियों वाले भविष्योन्मुखी संदर्भों में यह बात अज्ञानता वस की गई गलती से आगे निकल कर एक अपराध के रूप में स्थापित हो जाती है, आने वाली पीढ़ियों के साथ किया जाने वाला अपराध।

Ashwani Kumar लेखक के अपने विचार

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