Covid-19 एक प्रेम कथा….

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ओम शुक्ला

२१ मार्च, २०२०

 सुबह के 9 बज रहे थे समीर नयी सोसाइटी में घर का समान शिफ्ट कर रहा था; वो ट्रक  में से एक-एक सामान बहुत ही समझदारी और सूझ बुझ के साथ नौकरों  से उतरवा रहा था, तभी उसकी किताबों का एक बॉक्स ज़मीन पे गिर गया, उसने नौकर की तरफ गुस्से से  भरी निग़ाह से देखा और बिना कुछ कहे ज़मीन  पे बैठ के वहां गिरी हुयी किताबे उठाने लगा|

जब वो किताबेँ  उठा रहा था, तभी उसके सामने दो बहुत ख़ूबसूरत पैर आके रुक गए जिनके नैल बहुत ही सलीके से शेप्ड थे और उन पे पिंक कलर की नेलपेंट लगी हुयी थी, पांव का रंग दूध जैसे सफ़ेद था और  उस मे जा रही नसें  काले नागिन के जैसे लहरा रही थी, एक पाँव में बंधा कला धागा उनकी ख़ूबसूरती की पहरेदारी कर रहा था और उसपे मोतियों से सजी चप्पल, मनो ऐसा लग रहा था जैसे कोई स्वर्ग की अप्सरा आज ज़मीन पे उतर गयी हो|

जिस खूबसूरती  की पिक्चर का ट्रेलर अभी-अभी समीर ने देखा था उस पिक्चर को पूरा  देखने के लिए उसकी आँखे और दिल तड़प उठे थे;

उसने अपनी आँखों की चाहत के लिए गर्दन को जैसे ही ऊपर उठाया तो देख के दंग  रहा गया. उसके सामने एक लड़की खड़ी  थी, जिसने एक सफ़ेद रंग का चूड़ीदार सूट पहन रखा था, उसपे उसने लाल रंग का दुप्पटा ले रखा था, उसके सोने से सुनहरे खुले हुए बाल हवा में लहरा रहे थे, उसके सफ़ेद माथे पे छोटी सी लाल रंग की बिन्दी बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी, उसकी २ बड़ी बड़ी आँखे जो काजल से भरी हुयी थी, उनमे एक अलग ही रंग की ख़ुशी झलक रही थी, उसके कानों  के बड़े-बड़े इयररिंग हवा में झूल रहे थे जब भी हो हिलती वो चुपके से उसके गुलाबी गालों  को चुम लेते, मगर ये क्या इन आँखों के निचे ये सफ़ेद रंग का क्या था?

समीर, अपनी जगह पे खड़ा हो के जब उसके चहरे की तरफ देखता है; तो वो हैरान रह जाता है, उसने सफ़ेद रंग का मास्क पहन रखा होता है,

इस से पहले समीर कुछ समझ पता उसने समीर का हाथ पकड़ा और उसके हाथों  में ठीक वैसा ही एक मास्क पकडा  के “स्टे हेअल्थी एंड स्टे सेफ” बोल के चली गयी|

राहगीर में मुझे एक रहगुज़र मिला,

दिल में दर्द था, वो मुझे मरहम सा लगा

दिन-दुनिया से बेख़बर और अपनी किताबों  में डूबा रहने वाला समीर जब अगली शाम खुद के  लिए अदरक वाली चाय उबाल रहा होता है तभी उसके कानों  में तेज़ आवाज़  आनी  शुरू हो जाती है, इस तरह से चौ तरफ़ा आ रही इस आवाज़  को देखने वो अपनी बॉलकनी  की तरफ भागता है और बाहर का नज़ारा देख के दंग रह जाता  है|

पूरी सोसाइटी अपने घर के बॉलकनी में खड़ी होके थाली, घंटी और ताली बजा रही थी, एक अलग ही माहौल बना हुआ था पूरा आसमान इसी आवाज़ से गूंज रहा था. तभी समीर के घर की डोरबेल बजी और वो बहार निकला,  जब वो बाहर निकला तो उसे वहां कोई नहीं मिला, उसने चारों  तरफ देखा कोई दिखाई नहीं दे रहा था, उसने सीढ़ियों  की तरफ देखा वहां भी कोई नहीं था;

हार के जब वो अपने दरवाज़े  की तरफ मूड़ा तभी कुछ बच्चे ऊपर से भागते हुए निचे की तरफ आये, उस तेजी से भाग रही रेलगाड़ी  से बचने के लिए उसने सीढ़ियों  की ग्रिल का सहारा लिया, जैसे ही वो उसके पास से गुजरे वो सीधा खड़ा होक उनकी तरफ देख ने जा रहा था तभी ऊपर से भागती हुयी एक लड़की आ गयी तेज़ी में होने की वजह से उसका बैलेंस बिगड़ गया और वो गिरने लगी, उसे गिरता हुआ देख समीर ने उसका हाथ पकड़ के उसे अपनी तरफ खिंच लिया, तेज़ी से समीर की तरफ आने की वजह से वो उसकी बाँहों में आ गयी और समीर खुद को सम्हालते हुए वापस ग्रिल का सहारा लेता है|

इस अफ़रा- तफ़री  में समीर ने नोटिस किया की जो लड़की उसको बाँहों में है वो कोई और नहीं जो उसे कल मिली थी वही है| आज भी उनसे अपने चहरे पे वही सफ़ेद रंग का मास्क पहना हुआ था;

जब समीर की तेज़ गर्म सांसे उसके चहरे पे आये डर  को भगा रही थी उसी वक़्त समीर ने उसके चहरे से वि सफ़ेद मास्क हटा दिया,

मास्क हटते  ही समीर के अंदर एक 440 वॉल्ट का करंट दौड़ गया था, उसके सामने उसका आधा अधूरा ख्वाब पूरा हो गया था, उन बड़ी बड़ी काजल से भरी आँखों के निचे गुलाबी रंग की दो पंखुड़ियाँ  थी जिसकी दूसरी तरफ टाइड से वाइट चमकते दांत थे और उन दोनों की पहरेदारी पे बैठा एक काला तिल जो होंठ के ठीक निचे था;

समीर ख्वाबों  की दुनियाँ के सैर पे था की तभी उन काजल से भरी आँखो  में गुस्से का ज्वाला मुखी फट गया और वो ज़ोर से चिल्लाई “How  dare you to open my mask ?”

वो तो पता नहीं पर आपका नाम क्या है ? समीर ने धीमी आवाज में उसे जवाब दिया

गुस्से में तमतमायी वो समीर की बाँहों से निकलते हुए उसे धक्का देती है,और कहती है खुद को और खुद की आँखों को कण्ट्रोल में रखो ज़रा;

तुम्हे जब से देखा है न खुद पे कोई कण्ट्रोल है न आँखों पे;

अगर यही हाल रहा तो हज़ूर की तबियत जल्द हरी हो जाएगी|

आप अपना नाम बता दे, हम उसी से बेहाल हो जायेगे,

“नैना” एक ज़ोर की आवाज ऊपर से आती है, और वो वहाँ से पालक झपकते ही ग़ायब हो जाती है|

उसके जाने के बाद भी उसकी आँखे समीर पे ही टिकी हुयी थी, उसकी खुशबू सांसो में मिल गयी थी, उसका छुअन एक कवच बन समीर के देह पे छड़ गया था| 

पलट वो कप में अपनी चाय रहा था और दिल में उसका इश्क़ उबल रहा था

नैना, यही नाम तो सुना था समीर ने…

रूबरू हुए जब से हम, दिल को चैन है आराम;

एक आग सी लगी है सीने में, और आँखे यूँ ही यही है बदनाम

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