Blunt बातचीत विद राइटर- आशुतोष गर्ग…

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१. अपने बारे में कुछ हमारे पाठकों को बताईये, लेखन की शुरुआत करने से पहले आप क्या किया करते थे I

*मैं मूल रूप से राजस्थान का रहने वाला हूँ लेकिन पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई। स्कूली शिक्षा के बाद हिंदी में एम.ए. और पत्रकारिता तथा अनुवाद में पी.जी. डिप्लोमा किया। साथ ही एम.बी.ए. भी किया। पिता डॉ. लक्ष्मी नारायण गर्ग, प्रतिष्ठित लेखक एवं अनुवादक हैं। शायद इसलिए, अनुवाद और लेखन-कला विरासत में मिली। कविताएँ लिखने की शुरूआत स्कूल में हो गई थी। विगत 20 वर्षों से गंभीर लेखन का प्रयास जारी है। मैं अंग्रेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं में
लिखता और अनुवाद करता हूँ।

२.आपकी अभी तक कौन-कौन सी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, थोड़ा अपनी पुस्तकों के बारे में बताईये I 

*अनुवाद और मौलिक लेखन समेत अब तक 29 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसमें से 22 किताबें अनुवाद (हिंदी- अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी) हैं और शेष मौलिक रचनाएँ हैं। ज्यादा काम पौराणिक साहित्य पर है। अनुवाद श्रेणी में अशोक बैंकर, दलाई लामा, चित्रा बनर्जी, रस्किन बॉण्ड आदि कई बड़े लेखकों की किताबों के सफल अनुवाद किए हैं।
मेरे अपने तीन उपन्यास हैं – अश्वत्थामा और इंद्र (हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है – मैंने इसका अंग्रेजी अनुवाद स्वयं किया है)। तीनों उपन्यास काफी पसंद किए गए हैं। एक बच्चों की पहेलियों की किताब है, दो शब्द प्रयोग-कोश हैं और एक उद्धरणों का संकलन भी प्रकाशित है। अश्वत्थमा, जल्द ही अंग्रेजी और मराठी में भी उपलब्ध हो जाएगा।

आशुतोष गर्ग


३. पहली पुस्तक छपवाना कितना मुश्किल था और छपने के बाद के अहसास के बारे में बताईये I   

*मैंने लेखन की शुरुआत अनुवाद से की थी। अनुवाद का काम प्रकाशक स्वयं देता है इसलिए उसके छपने में समस्या नहीं होती। मौलिक लेखन की कहानी थोड़ी अलग है। पहली स्वतंत्र किताब पहेलियों की किताब थी। उसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन पहेलियाँ अच्छी और नई थीं इसलिए बात बन गई। किताब का छपना संतान-सुख के जैसा होता है। पीड़ा तो बहुत होती है लेकिन छप जाने के बाद का अहसास शब्दों से परे है – अप्रतिम और अवर्णनीय!


४. आपकी कौन-सी क़िताब का करैक्टर/लाइन आपको सबसे प्रिय है और आख़िर क्यूँ I 

*मैंने अभी तक दो मुख्य पात्रों पर उपन्यास लिखे हैं – अश्वत्थामा और इंद्र। ये दोनों पात्र मुझे अलग-अलग कारणों से पसंद हैं। अश्वत्थामा की स्थिति महाभारत में कुछ–कुछ कर्ण जैसी है। वह मुख्य पात्र होते हुए भी कृष्ण और अर्जुन आदि की चकाचौंध में उपेक्षित रह गया है। उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। यही बात इंद्र के साथ है। वह देवताओं का राजा है किंतु लोग उसके बारे में बहुत कम जानते हैं। लोगों को यह तक नहीं पता कि “इंद्र” किसी का नाम नहीं बल्कि देवलोक के शासक की पदवी है! मुझे ऐसे पात्रों को सामने लाना है जो पौराणिक साहित्य की दृष्टि से
महत्वपूर्ण हैं किंतु किसी कारण से उपेक्षित रह गए हैं।

५. कोई नया लेखक अपनी पहचान कैसे बनायेI 

*अन्य सभी कलाओं की तरह, लिखना भी एक कला है और उसे केवल अभ्यास से सीखा जा सकता है। अगर आप लिखना चाहते हैं तो पहले पढ़ने की आदत डालिए। जिस तरह का साहित्य लिखना चाहते हैं, उस श्रेणी के लेखकों को पढ़िए। यदि लिखना छलकना है तो पढ़ना भरने जैसा है। आप बिना भरे, छलक नहीं सकते! जहाँ तक पहचान की बात है तो इसकी चाहत सिर्फ एक भ्रम है, मरीचिका है। लेखक को यश पाने के लिए नहीं बल्कि केवल लिखने के लिए लिखना चाहिए। पहचान, आपकी मेहनत और लगन का प्रतिफल है। अपने आप मिल जाता है।

६. आप किस नई क़िताब पर काम कर रहे हैं, पाठकों के लिए संदेश I      

*भगवान विष्णु के दसवें अवतार “कल्कि” पर एक उपन्यास पूरा किया है। यह प्रभात प्रकाशन से शीघ्र प्रकशित होगा। यह किताब मैंने अपने 17 साल के बेटे, अत्रि गर्ग के साथ मिलकर लिखी है। यह उपन्यास पौराणिक साहित्य, गल्प, अंतर्राष्ट्रीय इतिहास और साइंस फिक्शन का जबरदस्त मिश्रण है। इसकी कहानी आपको कोरोना जैसी महामरियों में ईश्वर की भूमिका को नए सिरे से देखने में मदद करेगी। पाठकों के लिए यही संदेश है कि कोरोना के इस दौर में किताबों से अच्छा और सच्चा साथी आपको कोई दूसरा मिलना मुश्किल है। इसलिए खाली समय में किताबें पढ़िए और अच्छी किताबों के बारे में अपने मित्रों को भी बताइए।

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