यू ब्लडी मिडिल क्लास I

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हर बार ये सोचता हूं की आखिर मिडिल क्लास है कौन, फ़िल्मों के डायलॉग्स वाला “यू ब्लडी मिडिल क्लास” या फिर एक मजबूर बाप का अपनी बेटी को कहे जाने वाला डायलॉग “बेटा हम मिडिल क्लास हैं, हमें चुप रहना चाहिए। मिडिल क्लास वालों से हर बार उम्मीद रहती है की उन्हें चुप रहना चाहिए और चुपचाप से अपना काम करते रहना चाहिए। बिना उफ़ किए, क्योंकि दिक्कत एक और है, अगर मिडिल क्लास बोलता है तो खतरा सत्ता पर मंडराने लगता है। सत्ता को झुकना पड़ता है । एक बार ऐसे ही मिडिल क्लास का शिकंजी जैसा ठंडा ख़ून खौला था तो फिर जेपी आंदोलन ने देश की मजबूत प्रधानमंत्री तक को झुका दिया था । 1977 में पहली बार मिडिल क्लास ने अपनी राजनीतिक ताक़त दिखाई और पहली बार 24 मार्च को देश में एक गैर-कांग्रेसी सरकार ने जन्म लिया और मोरार जी देसाई भारत के प्रधानमन्त्री बन गए, जयप्रकाश नारायण के मूवमेंट ने उस वक़्त पूरे देश में अपने पांव पसार दिए थे और मिडिल क्लास ने उसमे बढ़चढ़कर हिस्सा लिया, क्योंकि वो उस वक़्त की सरकार से पूरी तरह से उकता गया था फिर उन्हें जेपी का दिखाया सपना पसंद आ गया। देश की राजनीति की दिशा एकदम बदल गई ।  

दरअसल मिडिल क्लास असल में वो कड़ी है, जो रिंग रोड के फ्लाइओवर जैसा हो गया है। वो फ्लाइओवर जो साउथ दिल्ली के एलीट्स और उत्तर पश्चिम दिल्ली के मध्यम और निम्न वर्ग को जोड़ देता है, लेकिन जब उच्च और निम्न वर्ग के बीच संघर्ष होता है तो हर बार ईएमआई मिडिल क्लास की ज़्यादा कट जाती है। लगातार मेहनत करते जाना, बिना किसी शिकवा के काम करना मिडिल क्लास वालों को बहुत अच्छे से आता है, बाप ने यही किया तो बीटा भी बाप के बाद वही करेगा, ये बात असल में दादा सिखा कर चले जाते हैं । मतलब बस एक कड़ी है, वो कड़ी जिसका रहना तो ज़रूरी है लेकिन बोलना नहीं…।

कई बार मिडिल क्लास वाले डर से नहीं बोलते कई बार ईएमआई के डर से, डर मिडिल क्लास वालों के मन में बसा दिया गया है कि अगर उन्होंने ज़रा भी सत्ता और सिस्टम के ख़िलाफ़ आवाज़ ऊंची की तो उनकी नौकरी जा सकती है और उनका वो सपना, “कि एक छोटा सा घर बनाऊंगा, एक छोटी गाड़ी ले लूंगा, 60 हजार पर रिटायरमेंट लेकर एक 200 गज़ का प्लाट लेकर उसपर एक फार्म हाउस बनाऊंगा और फिर भिंडी उगाऊंगा” ये सपना टूट सकता है ।

मिडिल क्लास को उसके सपनों ने इतना दबा दिया है कि वो कुछ नहीं कह पा रहा है, चाहे शाहीन बाग़ में औरतें बैठी हों, या बच्चों पर लाठियां पड़ें, लेकिन ये कुछ नहीं कहेंगे, क्यूंकि भइया कौन अपनी नौकरी खोना चाहता है । मिडिल क्लास को ये समझा दिया गया है कि चुप रहो और मौज लो। असल में बात ये है कि निम्न वर्ग वालों के पास खोने को कुछ नहीं हैं इसलिए वो भिड़ जाते हैं, लेकिन इनके पास खोने को वो 50 लाख वाला नॉएडा-ग्रेटर नॉएडा का 2 बीएचके फ्लैट है । वो फ्लैट इनको हमेशा याद दिलाता है कि सत्ता की तरफ से हुक़्म है, चुप रहें नहीं तो फ्लैट की चाबियां बैंक वाले कभी भी ले जा सकते हैं, बेशक वो बैंक का पैसा एक दिन कोई और ले जाए और लाखों की ड्रेस में घूमें लंदन की सड़कों पर, लेकिन मिडिल क्लास वाले तो पालिका में ये ही देखेंगे कि कहीं से सस्ती हूडी मिल जाए जिससे थोड़ा कूल भी दिखे और ठंड से भी राहत मिल जाए ।

1991 में  जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे तो उन्होंने देश को एक ऐसे संकट से उबारा जो उस समय बहुत मुश्किल दिखाई दे रहा था, उस वक़्त भारतीय अर्थव्यवस्था ने आर्थिक उदारीकरण का स्वाद चखा और इसकी सारी पटकथा मिडिल क्लास के कंधों पर लिखी गई, क्योंकि एक यही ऐसा वर्ग था जो भारत को संकट से उबार सकता था और इसने उबारा भी। सवाल है कि मिडिल क्लास है कौन? इस क्लास के बारे में यूनेस्को के पूर्व निदेशक रहे समाज शास्त्री योगेश अटल ने कहा था, ‘मध्यम वर्ग मूलतः एक सर्विस क्लास है, किसान नहीं है, गांव का नहीं है, शहरी है।’ मध्यम वर्ग का यही सर्विस क्लास होना राजनेताओ और सत्ताओं को सुहाता रहा है और इसी घोड़े पर सवार होकर 5 ट्रिलियन इकॉनमी बनने का ख़्वाब दिखाया जा रहा है, बाकी ये बात अलग है कि इस बारे में मध्यम वर्ग से राय ली जा रही है या नहीं।

पूरी दुनिया में मिडिल क्लास का बड़ा अहम रोल रहा है। सामाजिक बदलाव की पहल मध्य वर्ग के चेतना संपन्न लोगों ने की। यूरोप का पुनर्जागरण हो या भारतीय समाज का पुनर्जागरण हो, सभी में मिडिल क्लास की भूमिका बेहद प्रभावी रही। फ्रांस की पहली राज्यक्रांति हो या अमेरिका का स्वतंत्रता आंदोलन हो या भारत की आज़ादी की लड़ाई हो सभी जगह मध्यमवर्ग ने बड़ी प्रगतिशील भूमिका निभाई।  

1931 से 1985 के दशक के अमेरिका में ऑर्सन वैल्स नाम के एक अभिनेता थे, उन्होंने एक बार कहा था कि “मिडिल क्लास सोसाइटी का दुश्मन है और मिडिल एज ज़िन्दगी का दुश्मन है” । किसी भी देश की बात कर लीजिए वहां का मिडिल क्लास सोसाइटी को बनाने और बिगाड़ने की दिशा और दशा तय कर देता है । अंग्रेज़ों के शासन में समाज के निचले और ऊपरी हिस्से के लोगों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खुलकर मोर्चा लिया, लेकिन मिडिल क्लास वहां भी समझदार निकला और वो एडजस्ट कर गया । आजादी के बाद भारत निर्माण में मिडिल क्लास की भूमिका ज़ोरदार रही और नेहरू के सपने को साकार करने में हिन्दुस्तान जी जान से जुटा था। जब आजाद भारत अंग्रेज़ी खांचे से बाहर निकल रहा था, उस वक्त लोग ट्रैक पर थे, लेकिन जैसे-जैसे हिंदुस्तान की राजनीति में परिवर्तन आया वैसे ही मिडिल क्लास भी बदल गया। समाज के इस अति-महत्वपूर्ण हिस्से ने बीच का रास्ता चुन लिया और अपने फायदे नुकसान को देखते हुए हर बार ये देखने की कोशिश की उसको कहां फायदा होगा और वो उसी रास्ते पर चल निकला ।

आज कल तो मिडिल क्लास के भी कई हिस्से हो गए हैं, एक लोअर मिडिल है और एक अपर मिडिल, लेकिन राजनीति में दोनों ही हिस्से सिर्फ वोट देने के काम आते हैं । अब चाहे वो 8 हज़ार रुपये में काम करने वाला राम धनी हो, जो पीरा गढ़ी की फैक्ट्री में काम करता है और अपनी बेटी के एडमिशन के वक़्त नेताओं से एक लेटर लिखवाने के लिए 10 दिन आगे-पीछे घूमता है या फिर अशोक हो, जो कनॉट प्लेस में एडविन लुट्येन्स की डिज़ाइन की हुई इमारत में एक महंगे ब्रांड के शोरूम में 15,000 रुपये में काम करता है, लेकिन शायद ही उस ब्रांड का कुछ कभी खरीद पाएगा, क्यूंकि वो “मिडिल क्लास” से आता है।

अगर एक रूढ़िवादी भारतीय परिवार की बात करें तो परिवार में मुख्यतः 4 सदस्य ही होते हैं, जिस परिवार की आय 90 हज़ार रुपये से कम है वो गरीब परिवार से माना जाता है, जिस परिवार की आय 90-2 लाख सालाना है उन्हें निम्न आय वर्ग और 2-5 लाख सालाना आय वालों को मध्यम वर्ग में विभाजित किया गया है। देश में सिर्फ मिडिल क्लास की बात करें तो भारत की जनसंख्या का 3% मध्यम वर्ग में आता है। ये एक कड़वा सच है कि भारत में कुछ परिवार बहुत अमीर हैं तो वहीं कुछ अभी गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर हैं। इन्हीं लोगो में से थोड़ा बहुत उठकर लोग मध्यम वर्ग में बड़ी मेहनत से पहुंचते हैं जिनका इस्तेमाल राजनेता बड़ी ख़ूबसूरती से करते हैं।

अगर बात भारतीय राजनीति की करें तो शायद सबसे गलत इस्तेमाल मिडिल क्लास का भारतीय राजनीति ने ही किया है, फिलहाल बस एक वोट बैंक की हैसियत रह गयी है। टीवी की 7 बजे के बाद वाली डिबेट्स में उलझा दिया गया है लेकिन वो अब सिसक रहा है। क्यूंकि शायद अब उसको समझ आ गया है कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है, उसको समझना ही होगा। नहीं तो देर हो जाएगी और उसको बच्चों को भी यही करना होगा। राजनीति के लिए मिडिल क्लास को लुभाना सबसे आसान है। राजनेताओं को लगता है कि ये सबसे उलझा हुआ सेक्शन है, इसके कुछ लोग पीरा गढ़ी में भी रहते हैं, कुछ पंजाबी बाग़ की कोठियों में भी रहते हैं और इसी असमानता का फायदा आराम से उठा लिया जाता है, और तैयार किया जाता है एक और वोट बैंक जो इलेक्शन वाले दिन ये सोच कर फोटो ट्वीट कर देता है कि उसको वोट ने देश की दिशा और दशा में बदलने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लेकिन जैसे ही उसके पास इन्फ्लेशन रेट के ऊपर-नीचे उतरने के आंकड़े आते हैं तो उसकी सांसें भी उसके साथ ऊपर नीचे होने लगती हैं। फिर वो इस बात की भी लड़ाई करता है कि सब्ज़ी वाले ने सब्ज़ियों के साथ एक्स्ट्रा में मिर्च क्यों नहीं दी ।

1996 में जब भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का स्वाद चखा तो उनको जिताने में भी भारतीय मध्यम वर्ग की एक बहुत बड़ी भूमिका थी और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया गया वो अलग बात है कि उनकी सरकार ज़्यादा दिन सत्ता में नहीं रह पाई, लेकिन एक बार फिर 1999 से 2004 के बीच अटल प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे और लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे। इसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत के माध्यम वर्ग कि रही, क्योंकि माध्यम वर्ग को एक नया मसीहा चाहिए था और उन्हें वो मसीहा अटल में नज़र आया। 2014 में मिडिल क्लास एक बार फिर से पशोपेश में पड़ गया, क्योंकि बढ़ती महंगाई और लगातार हो रहे घोटाले से उसका मन खिन्न हो गया था तो एक बार फिर माध्यम वर्ग ने बदलाव चाहा और नरेंद्र मोदी को अपना नेता मान लिया। बस मिडिल क्लास के साथ परेशानी ये रही है कि वो लगातार सत्तायें तो बदल रहा था, लेकिन अपनी परिस्थितियां बदल पाने में वो नाक़ाम रहा।

लेकिन मिडिल क्लास ज़रूरी है। डेमोक्रेसी के लिए इसका भी अलग ही विज्ञान है। अगर मिडिल क्लास नहीं रहा तो काम रुक जाएगा। सभी उद्योग धंधे चौपट हो जाएंगे और शायद सभी नेताओं को भी वीआरएस लेना पड़ जाए । एक आम आदमी को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाकर भी मिडिल क्लास आम आदमी ही रह जाता है, “क्रिकेट की दुनिया में मिडिल विकेट का बहुत ज़्यादा महत्व है, क्योंकि उसको अंदाज़े में लेकर ही गेंदबाज़ और बल्लेबाज़ अपना स्टान्स बनता है शायद ठीक उसी तरह से भारतीय राजनीति भी मिडिल क्लास को ध्यान में रखकर ही अपनी राजनीति को चमकाने का स्टान्स बना लेती है । 

प्रवीण झा

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