भारत , भारतीयता के अन्त:निहित कटु आयाम

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भारत , भारतवर्ष , एक भारतीय होने के क्या मायने हैं यह इतना सीधा सरल नहीं है जितनी सहजता से इसे समझाने का प्रयास किया गया है या किया जाता है |

सहजत: एवं लोकप्रिय रुप में भरत के वंशजों के देश में देखने का प्रयास देश के भोगोलिक विस्तार , तत्कालीन अन्य राजवंशों के अशि्त्तव एवं महत्ता का आकलन किये गये बिना,भरत वंश के राज्य की वास्तविक महत्व एवं राजनीतिक योगदान का सही सही आकलन किये गये बिना,सीधा सरलीकरण एवं समाज गंभीरता से रहित पृयास ही कहा जा सकता है |

वैसा ही कुछ जैसे गुप्तकालीन या मुगलकालीन राज्यव्यवस्था में लगभग ८०% आबादी की यथास्थिति का आकलन किये गये बगैर हम देश के स्वर्ण काल को देखने का प्रयास करते हैं |

यह लगभग ८० % आबादी जिसे 1947 के बाद जीवन की अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापक जद्दोजहद के रूप में पृयासरत देखा जा सकता है इसके पिछले इन्हीं वर्षों में किये गये पृयासो से देश में हासिल की गयी आज की यथास्थिति का आकलन कर,शेष इतिहास में इनकी स्थिति का आकलन करने का प्रयास किया जाना चाहिए ।

संभवतः यह दुर्दात आकलन , भारत एवं भारतीयता को समझने का नया आयाम पृदान कर सकेगी, 15-20% लोगों की वैचारिक सोच,देश की सोच के रूप में देखना कतिपय उचित नहीं है|

वैचारिक महानता ,उच्च आदर्श एवं मूल्य के रूप में स्थापित भारतीय संस्कृति क्या सभी देशवासियों की हित साधन करती है या इसका सारोकार महज 15-20%आबादी से है? महत्वपूर्ण , कटु एवं निश्चय है व्यापक वैचारिक आयाम एवं परिपेक्ष्य में भारत एवं भारतीयता को देखने की आवश्यकता है ।

क्या 80%आबादी को छद्म राष्ट्रवाद के अन्तर्गत उनके राष्ट्रीयता के अधिकारों का गला घोंटा गया है । एक राष्ट्र 80%आबादी के हितों के विरुद्ध एतिहासिक रूप से कभी नहीं रह सकता है । भारत का अनोखा स्वरूप समझने के लिए विविध वैचारिक अध्ययन विषयक मूल विद्यमान है समह है कुछ लोग इस दिशा में सोचें। मात्र एक स्वर में भारत माता की जय बोलकर 80% आबादी का हित शोधन नहीं हो सकता है।

लेखक – LalMani Singh
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