पायलट की पॉलिटिकल फ्लाइट I

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कुछ दिनों पहले राजस्थान की रेत ने एक बार फिर से पलटी मारी थी और कांग्रेस ने अपने ही उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को “आई लव बट एज़ अ फ्रेंड” कहकर उन्हें पार्टी और पद दोनों से बर्खास्त करके बाहर का रास्ता दिखा दिया I सचिन पायलट एवं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत में काफी समय से किट्टी पार्टी की भांति लड़ाईयां चल रही थी और आख़िरकार ये लड़ाई बंद कमरों से सड़क पर आई और ऐसी आई की माशूक़ की शादी किसी और से हो जाए ठीक वैसा ही तमाशा हो गया I गहलोत जी ने संभालने की काफ़ी कोशिश की लेकिन तब तक सचिन पायलट धड़कन फ़िल्म के सुनील शेट्टी की तरह बदले की आग़ में झुलस रहे थे और आख़िरकार उन्होंने पार्टी के खिलाफ़ कड़ा मोर्चा खोल दिया I गहलोत साहब से पायलट के मतभेद काफी समय से परकोटे की गलियों में अफ़वाह बनकर घूम रहे थे और जब सचिन से रहा नहीं गया तो उन्होंने कह दिया की “गहलोत सरकार अल्पमत में हैं” I राजनीति में अल्पमत शब्द बहुत मायने रखता है क्यूंकि जब आप अल्पमत में होते हैं तो कोई आपको फ्रेंडशिप बैंड नहीं बांधता लेकिन सवाल ये था की बिना ठोस समर्थन के सचिन ने ऐसा बयान दे दिया या उन्होंने इससे पहले काफी सोचा होगा I क्यूंकि सचिन के पास ना स्पष्ट बहुमत था और ना ही पक्के दोस्त, उनके जो पहले दोस्त थे भी उनमें से आधे से ज्यादा गहलोत जी के फ्रेंड बन चुके थे I गहलोत जी की राजनितिक कुशलता और कुटिलता ने पायलट का राजनीतिक जहाज़ बहुत पहले ही क्रैश करवा दिया था और इसी चीज़ की नाराज़गी ने पायलट को बाग़ी बनने पर मजबूर कर दिया I लेकिन क्या सचिन पायलट इतने मासूम हैं की उनको 4 मीडिया रिपोर्ट्स में स्टारडम मिलने या तथाकथित भाजपा से मिले ऑफर की वज़ह से वो बातों में आ गए और उन्होंने बग़ावत जैसा भारी फ़ैसला लेने की सोच ली I ये सब इतना आसान नहीं हैं जितना दिखता है, जयपुर और राजस्थान में ये ये बात सभी जानते हैं की सचिन और गहलोत साहब के रिश्ते में खटास शपथग्रहण के समय से देखी जा रही थी I सचिन पायलट का कहना था की उन्होंने वसुंधरा राजे जी के मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी सरकार के खिलाफ़ सड़कों पर मेहनत की और इसकी एवज़ में उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलनी चाहिए थी जो नहीं दी गई, देखा जाए तो सचिन की ये बात काफी हद तक ठीक भी थी क्यूंकि जिस वक़्त वो संघर्ष कर रहे थे उस वक़्त गहलोत दिल्ली में और बाकी राज्यों में प्रवास कर रहे थे पार्टी के कार्यो को लेकर I सचिन ने उस वक़्त राजस्थान में कांग्रेस पार्टी की कमान संभाल रखी थी और वो सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे I लेकिन जब कांग्रेस की राजस्थान में सरकार बनती है तो सचिन पायलट को दरकिनार करते हुए अशोक गहलोत को राज्य की कमान एक बार फिर से दे दी और सचिन को कम्पनसेटरी उपमुख्यमंत्री की भूमिका निभाने को दे दी I सचिन पायलट ने कहा की अधिकारी उनके आदेशों को नहीं मानते थे और इसके अलावा कई कहानियाँ जयपुर के राजनीतिक गलियारों में फ़ैली हुई हैं I

हालात उस दिन ज्यादा बिगड़ गए जब सचिन पायलट के बग़ावती तेवरों के देखते हुए स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप की तरफ़ से सचिन पायलट को कमिटी के सामने पेश होने का नोटिस दे दिया गया इसके बाद एक सचिन ने बहुत सारी बातें कहीं जिसमें सबसे ज़्यादा मुख्य “ऐसी बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा” थी I जो लड़ाई अब तक राजस्थान पॉवर कॉरिडोर के बंद कमरों में चल रही थी अब वो एकदम सड़कों पर आ गई I पार्टी ने संभालने की कोशिश की लेकिन कोई भी धरा चुप बैठने को तैयार नहीं था और स्थिति ख़राब होती चली गई I

यूँ तो सचिन पायलट के पास अमेरिका से निजी पायलट का लाइसेंस हैं और इसके साथ-साथ वो एक बढ़िया शूटर भी हैं लेकिन राजस्थान की राजनीति में निशाने ज़्यादातर बार अशोक गहलोत ने ही मारे हैं I सचिन के पिता स्व. राजेश पायलट कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में से एक थे और उनकी राजनीतिक विरासत को सचिन ने बहुत बेहतरीन तरीके से संभाला, सचिन ने जम्मू-कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुल्ला की बेटी सारा अब्दुल्ला से 2004 शादी की I राजस्थान का उपमुख्यमंत्री बनने से पहले सचिन पायलट ने 14वीं लोकसभा के दौसा संसदीय क्षेत्र से सबसे कम उम्र के सांसद के रूप में चुने गए I 2014 में वो भाजपा नेता संवर लाल जाट के सामने लोकसभा चुनाव हार गए थे I उसके बाद से ही उन्होंने राजस्थान विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी और आख़िरकार मेहनत रंग लाई और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बन पाई लेकिन ये सब होने के बावजूद भी सचिन मुख्यमंत्री नहीं बन पाने का मलाल लिए बैठे रहे I जिस हिसाब से बीते दिनों में घटनाक्रम रहा है उसे देखते हुए सचिन के पास भाजपा में जाने का विकल्प था लेकिन वो बार-बार ये कह रहे हैं की वो ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे हैं I सूत्रों के हिसाब से भाजपा का ग्राउंड कैडर भी इस बात से ज़्यादा ख़ुश नहीं है की पायलट का आगमन भाजपा में हो, वैसे भी राजस्थान भाजपा में मुख्यमंत्री पद के बहुत से उम्मीदवार हैं और जब तक वसुंधरा राजे सिंधिया हैं तब तक सचिन के लिए भाजपा से मुख्यमंत्री बन जाना मुश्किल है I अशोक गहलोत ने खुलकर युवाओं में बढ़ हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर बढ़ रहे आकर्षण के लिए कई बातें कह दी जिसके बाद अब स्थिति काफी रोचक हो गई है I सचिन वापस कांग्रेस में आते हैं और भाजपा के भगवा को अपना लेते हैं ये उन्हें खुद तय करना है I सचिन के पास राजस्थान में तीसरा मोर्चा खड़ा करने का विकल्प है जिसे वो इस थीम पर रखकर बना सकते हैं, “ठुकरा के मेरा प्यार तू मेरा इंतेक़ाम देखेगी” I लेकिन गहलोत पुराने खिलाड़ी हैं अगर सचिन वापस कांग्रेस में आये तो इस बार उनकी राहें पहले से ज्यादा मुश्किल होंगी I

वैसे राजस्थान में एक कहावत काफी चलती हैं, “अरे ठंडा करके खाओ” लेकिन सचिन ने तुरंत गरम खाने की सोच ली थी I आगे क्या होगा ये बात सिर्फ बंगला नंबर 8 सिविल लाइन्स को पता है I

फिलहाल राजस्थान का सियासी ड्रामा सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट से होते हुए अब राजभवन की तरफ  शिफ्ट हो गया है, काफी दिनों से गहलोत साहब और उनके विधायक जयपुर शहर से थोड़ी दूर एक होटल से सरकार चला रहे थे लेकिन आज दोपहर ये सभी विधायक बसों से लगभग 2:30 बजे राजभवन पहुँच गए I सभी विधायक विधानसभा सत्र बुलाने की माँग के लिए राज्यपाल कलराज मिश्र से रिक्वेस्ट करने राजभवन गए थे I फ़िलहाल कोर्ट की तरफ से सचिन पायलट समूह को फौरी राहत ही मिली मानी जाएगी क्यूंकि अभी इनकी बर्खास्तगी पर स्टे लगा हुआ है, आने वाला समय राजस्थान और मरुधरा की संपूर्ण राजनीति के लिए बहुत पेचीदा होने वाला है I

और सबसे रोचक इसमें राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जी की ख़ामोशी हैं जिन्होंने अभी तक ज्यादा कुछ ख़ास टिप्पणी नहीं की है I

बाकी जादू किसका चलता है ये तो वक़्त बताएगा, गहलोत या सचिन I  

प्रवीण झा 

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