दूसरी दुनिया के सफ़र पर निकला शायरी का सबसे चमकता सितारा

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11-अगस्त-2020    

आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

जितनी जिंदादिली की बात ये शायरी पढ़कर पता चलती है, वैसी ही जिंदादिल शख़्सियत के मालिक थे जनाब डॉ. राहत इन्दौरीसाहब। जिनका आज 11 अगस्त 2020 को इंदौर शहर के ऑरोबिंदो अस्पताल में 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। खबरों से पता चला है कि उनका कोरोना का इलाज चल रहा था और आज दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

जिस तरह से 1 जनवरी का दिन हर शख़्स की ज़िंदगी में खास होता है। वैसा ही 1 जनवरी 1950 का दिन पूरे देश के लिए खुशियाँ लेकर आया। इंदौर के रहने वाले रफतुल्लाह क़ुरैशीऔर उनकी बीवी मक़बूल उन निसा बेग़मके घर राहत क़ुरैशीने जन्म लिया। किसे पता था कि एक दिन ये आगे जाकर देश के सबसे बड़े शायर राहत इंदौरीके नाम से जाने जाएंगे।

अपने चार भाई बहनों में राहत साहबसबसे छोटे थे। उन्होंने अपनी स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई इंदौर से ही पूरी की। बाद में भोपाल की बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटीसे उर्दू लिटरेचर में M.A. किया। राहत साहब को वर्ष 1985 में उर्दू साहित्य में डॉक्टरेटकी उपाधि से सम्मानित किया गया।

उन्होंने लगभग 20-22 साल की उम्र में ही मुशायरों में अपना नाम बना लिया था। भारत के साथ साथ दुनिया के अनेक देशों के बड़े बड़े मुशायरों में 40-45 साल तक उन्होंने अपना जादू बिखेरा। लोग उनकी शायरी पर ही तालीयाँ नहीं बजाते थे बल्कि शायरी बोलने की उनकी अदा के भी लोग क़ायल थे। यही वजह रही कि उन्हें अनेक तरह तरह के पुरुस्कारों से साल दर साल नवाज़ा गया।

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क़ ख़ता है तो, ये ख़ता एक बार नहीं सौ बार करो

 


राहत साहबने हमेशा ही अपनी ग़ज़लों व शायरियों के माध्यम से आपसी भाईचारे का संदेश दिया। उन्होंने हमेशा अपने देश की भाईचारे की मिसाल को अपनी शायरियों के ज़रिए दुनिया के सामने रखा। उन्होंने न सिर्फ़ युवा बल्कि हर उम्र के लोगों को मुहब्बत का पाठ पढ़ाया।

जितने अच्छे फनकार वे उर्दू की ग़ज़लों के माने जाते थे , उतने ही अच्छे वो एक गीतकार भी साबित हुए। उनकी ग़ज़लों ने मुशायरों से आगे निकलकर भारतीय सिनेमा जगत में भी गीतों के रूप में अच्छी खासी जगह बनाई। अनेक फिल्में जैसे खुद्दार‘, ‘इश्क़‘, मुन्नाभाईआदि फिल्मों में उन्होंने बेहतरीन गीत लिखे। उन्होंने अपनी ग़ज़लों व शायरियों को कागज़ की शक्ल देते हुए कुल 7 किताबों में उतारा।

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

जब भी राहत साहबको लोगों ने मज़हबी चोला पहनाने की कोशिश की, तबतब उन्होंने अपनी शायरियों व ग़ज़लों से लोगों को मुँहतोड़ जवाब दिया। उनका हमेशा भारत की कौमी एकता, अखण्डता व प्रभुता में विश्वास था। उन्होंने हमेशा धर्म से आगे अपने वतन को प्राथमिकता दी शायद इसलिए वो हर दिल अज़ीज़ शायर भी कहलाये।

एक ज़िंदादिल इंसान होने के साथ साथ वो काफ़ी बेबाक़ इंसान भी थे। उन्होंने हमेशा खुले मंचों से चुनोतियाँ देते हुए अपनी बातें सामने रखी। उन्होंने हमेशा गलत को गलत कहने का माद्दा दिखाया। सरकारों के प्रति भी उनके तेवर कभी कभी तल्ख़ रहे।

ऊँचे ऊँचे दरबारों से क्या लेना
नंगे भूखे बेचारों से क्या लेना
अपना मालिक अपना ख़ालिक़,अफ़ज़ल है
आती जाती सरकारों से क्या लेना

आज उनके निधन की खबर सुनकर पूरा भारत देश ग़मगीन है। मानो जैसे आज आसमान में एक सितारा और जुड़ गया जो हमेशा वहाँ से अपनी चमक बिखेरता रहेगा। उन्हें उनके ही अंदाज़ में श्रद्धांजलि देना चाहूँगा।

गुलाब, ख़्वाब, दवा, ज़हर, ज़ाम, क्या क्या है
मैं आ गया हूँ बता इंतज़ाम क्या क्या है

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