“तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया तू ने ढ़ाला है और ढ़ले हैं हम” : जावेद अख़्तर

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“तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया
तू ने ढ़ाला है और ढ़ले हैं हम”

इन्सान किसी के कहने या बताए रास्ते पर चलने से महान नहीं बनता है। वो महान बनता है खुद को विपरीत परिस्थितियों में ढालने और खुद के रास्ते पर चलने से। ऐसे ही एक महान शख़्स के बारे में बताने जा रहा हूँ जिन्होंने खुद को विपरीत परिस्थितियों में ढ़ाला है और आज एक ऊँचा मक़ाम हासिल किया है। उस शख़्सियत का नाम “जावेद अख़्तर” साहब है।

बात है 17 जनवरी 1945 की जब ग्वालियर शहर में उस वक़्त के उर्दू के बड़े शायर “जाँ निसार अख़्तर” और “साफिया सिराज-उल-हक” के यहाँ “जादू” यानी “जावेद अख़्तर” साहब का जन्म हुआ। अपने पिता और दादा के इतने बड़े शायर होने की वजह से उन्हें बचपन में घर पर ही उर्दू अदब की तालीम मिल गयी थी। वो पाकिस्तानी लेखक “इब्न-ए-साफी” से काफी ज्यादा प्रभावित थे।

बचपन में ही उनकी माँ का इंतेक़ाल हो गया था और उनके वालिद उन्हें छोड़कर मुम्बई बस गए थे। इस वजह से जावेद साहब का बचपन अपने ननिहाल में बीता। जावेद साहब की पहली शादी “हनी ईरानी” से हुई। उनसे उन्हें दो बच्चे “ज़ोया” और “फरहान” हैं। अपनी दूसरी शादी उन्होंने उर्दू के बड़े शायर “कैफ़ी आज़मी” जी की बेटी “शबाना आज़मी” से की। इसी महीने जावेद साहब ने अपने जीवन के 76 बरस पूरे किए हैं।

“क्यों डरें ज़िन्दगी में क्या होगा
कुछ ना होगा तो तज़ुर्बा होगा”

जावेद साहब की लिखी ये लाइनें ज़िन्दगी में हमेशा कुछ नया करने का हौसला देती है। जावेद साहब की ज़िन्दगी को हम इन दो लाइनों में उतार सकते हैं। उन्होंने भोपाल से पढ़ने के बाद मुम्बई की तरफ कदम बढ़ाए। अपने पिता से मुलाक़ात की और ये कहते हुए “आपसे अब दोबारा नहीं मिलूँगा” विदा ली। उन्होंने कई दिन रेलवे स्टेशन पर बिताए और फाके झेले। लेकिन कुछ करने का अपना हौसला नहीं टूटने दिया। साल 1971 में वो दिन भी आया जब उन्होंने बॉलीवुड में अपने सफर की शुरुआत की।

जावेद साहब एक राइटर, गीतकार, पटकथा लेखक, शायर और राजनीतिज्ञ भी हैं। उन्हें लेखन तो “विरासत” में मिला है। उन्होंने “सलीम खान” साहब के साथ मिलकर साल 1971 से साल 1982 तक कुल 24 फिल्में लिखी। उनमें से 20 फिल्में हिट साबित हुई। जिसकी वजह से उन दोनों की जोड़ी ने शौहरत की नई बुलंदियां छुई। वो “सलीम-जावेद” की लिखी फिल्में ही थी जिन्होंने “अमिताभ बच्चन” का कद बॉलीवुड में आला मक़ाम पर पहुँचा दिया।

“दर्द के फूल खिलते हैं बिखर जाते हैं
ज़ख्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं”

अपने काम से शौहरत पाने वाले जावेद साहब को एक के बाद एक, दो बड़े झटके लगे। पहला झटका साल 1982 में लगा जब “सलीम-जावेद” की जोड़ी आपसी झगड़े की वजह से टूट गयी। दूसरा झटका साल 1984 में लगा जब उनका “हनी ईरानी” से तलाक हो गया। जैसा जावेद साहब फरमाते हैं “ज़ख्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं।” बतौर गीतकार साल 1982 से उन्होंने फिर से सफर शुरू किया। वो अब तक सौ से भी ज्यादा फिल्मों में गाने लिख चुके हैं।

जावेद साहब की अभी तक दो किताबें “तरकश” और “लावा” प्रकाशित हुई हैं। उनकी पुरुस्कारों की फेहरिस्त भी कुछ कम नहीं है। उन्हें अबतक लगभग 26 पुरुस्कार प्राप्त हो चुके हैं। जिनमें “पद्म भूषण, पद्म श्री, नेशनल फ़िल्म अवार्ड, साहित्य अकादमी पुरस्कार और रिचर्ड डॉकिन्स अवार्ड प्रमुख हैं। साहित्य और बॉलीवुड से इतर उन्होंने 16 नवम्बर 2009 से लेकर साल 2016 तक “राज्य सभा” सांसद के रूप में भी परचम लहराया है।

“हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा”

जावेद साहब को हमेशा उनकी बेबाकी के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन ये कहना बिल्कुल ग़लत नहीं होगा कि उनकी शायरियों में हक़ीक़त और तल्ख़ी रहती है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में जो भी जिया है, उसे वैसे ही कागज़ पर उतारा है। जावेद साहब को पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि उन्हें ज़िन्दगी से शिकायतें भी खूब रही हैं और दर्द भी खूब मिले हैं।

जावेद साहब के नाम उनका लिखा ही शेर पढ़ना चाहूँगा।

“कोई याद आये हमें कोई हमें याद करे
और सब होता है ये किस्से नहीं होते हैं”

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