फ़िल्म स्काई इज़ पिंक का रिव्यु….

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“हर एक का अपना आसमान होता है और अगर तुम्हें लगता है तुम्हारा आसमान Pink है तो वो PINK है बस”

हर इन्सान का अपना अलग नज़रिया होता है, अलग सोच होती है और अलग टेस्ट होता है। जो लोग भीड़ से अलग होते हैं अक्सर हम उन्हें बेवकूफ मान लेते हैं। ऐसे ही हर इन्सान का अपना अलग आसमान होता है जिसमें उसके मुताबिक रंग होता है।

बात हो रही है साल 2019 में आई फ़िल्म “The Sky is Pink” की जिसकी कहानी और डायरेक्शन दोनों को “शोनाली बोस” ने पूरा किया। फ़िल्म में गीत “गुलज़ार साहब” ने लिखे हैं और उन गीतों को लयबद्ध “प्रीतम दा” ने किया है।

“The Sky is Pink” असल में “आइशा चौधरी” की ज़िंदगी पर आधारित फिल्म है। जिसे एक बहोत ही गंभीर Disease है। जिसे Severe Combined Immune Defeciency (SCID) कहते हैं। इस बीमारी की वजह से बच्चा बिना इम्युनिटी के पैदा होता है और कुछ ही दिनों में या घण्टों में उसकी मौत हो जाती है।

फ़िल्म में आइशा चौधरी के किरदार में “जायरा वसीम” हैं तो उनके माता-पिता ‘अदिति चौधरी’ और ‘निरेन चौधरी’ के किरदार में क्रमशः “प्रियंका चोपड़ा जोनास” और “फरहान अख़्तर” हैं। वहीं “रोहित सराफ” ने उनके भाई ‘ईशान चौधरी’ का रोल किया है।

कहानी शुरू होती है दिल्ली के चाँदनी चौक में रहने वाले “चौधरी” परिवार के साथ। जिन्हें पता चलता है कि उन्हें तीसरा बच्चा होने वाला है। कहानी में थोड़ा सा पीछे चलते हैं जहॉं पहली संतान को वो SCID की वजह से खो चुके हैं और दूसरी सन्तान ‘ईशान’ है। तीसरी सन्तान एक बेटी के रूप में होती है जिसका नाम ‘आइशा’ रखा जाता है।

‘आइशा’ को भी SCID की बीमारी है। जिसका इलाज करवाने के लिए ‘अदिति’ और ‘निरेन’ अपनी सारी सेविंग्स लेकर लंदन का रुख़ करते हैं। यहाँ से उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान शुरू होता है। जो पूरी तरह से उनकी ज़िंदगी बदल कर रख देता है।

कहते हैं ना कि “इन्सानियत से बड़ा कोई मज़हब नहीं होता”। ऐसा ही लंदन के लोग ‘बेबी आइशा’ के आपरेशन के लिए पैसे जुटाकर साबित करते हैं। कीमोथेरेपी से ‘आइशा’ बच जाती है लेकिन उसे पूरी तरह से रिकवर होने में 13 साल लग जाते हैं।

“आइशा” ने तीनों लोगों को अपनी पसंद के निकनेम दिए हैं। वो अपने पापा को ‘पेंडा’ , माँ को ‘मूज़’ और भाई को ‘जिराफ़’ बुलाती है। उसके अनुसार उसकी माँ के अगर हाथ में होता तो वो हर मुमकिन कोशिश करके अपनी पहली बेटी को भी बचा लेती। वो एक नरम दिल और योद्धा है इसलिए उसने उन्हें “मूज़” नाम दिया है। इन 13 सालों में ‘मूज़’ की ज़िन्दगी सिर्फ़ “आइशा” के इर्द गिर्द ही गुज़री थी।

13 साल बाद पूरा “चौधरी” परिवार लंदन से वापिस दिल्ली के पास छतरपुर फार्म हाउस में शिफ्ट हो जाता है। लेकिन होता वही है जो किस्मत में लिखा है। ‘आइशा’ के LUNGS COLLAPSE कर जाते हैं। डॉक्टर्स कहते हैं कि उसके पास अब सिर्फ़ 3-4 साल ही बचे हैं।

“मूज़” एक बार फिर से पूरी फैमिली के साथ “प्रोजेक्ट आइशा” शुरू कर देती है। क्योंकि वो चाहती है कि “आइशा” ज़िन्दगी की हर खुशी महसूस कर सके उसे जी सके। माँ को ‘योद्धा’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। वो अपने बच्चों के लिए आखिरी क्षण तक जंग करती है।

“दुःख हर किसी को अंदर से निचोड़ देता है”

कौन माँ-बाप अपने बच्चों को हारता हुआ देखना चाहते हैं या अपने सामने उन्हें यूँ ही मौत के हवाले कर देना चाहते हैं। हमें कभी ये अंदाज़ा ही नहीं होता कि हमारे माँ-बाप ने हमें बड़ा करने में कितना संघर्ष किया है। अपनी नींदें, अपने शौक़, अपनी ज़िंदगी सब कुछ जोड़कर हमें खड़ा किया है। शायद इसीलिए माँ-बाप को “भगवान” का दर्ज़ा दिया गया है।

हमारे जन्म लेने से पहले ही हमारी ज़िंदगी, हमारी मौत सब तय हो जाती है। किसी की ज़िंदगी लंबी होती है। किसी की ज़िंदगी छोटी होने के बावज़ूद ‘बड़ी’ होती है। हमें जीना किस तरह से है, हमारा सफर किस तरह से तय करना है ये हम खुद डिसाइड करते हैं। तो खुद की कहानी को हमें हमेशा “बड़ा” ही बनाना चाहिए।

ऐसी ही “आइशा” की 18 साल की ‘बड़ी’ ज़िन्दगी रही। जहाँ उसने ज़िन्दगी के ऊपर Motivational Speech दिए तो खुद की एक किताब भी लिखी। उसने बताया कि ज़िन्दगी और मौत हमारे हाथ में नहीं है लेकिन हम हँसते हुए मुश्किल ज़िन्दगी को भी आसान बना सकते हैं।

ऐसे ही हमारी ज़िंदगी को तराशने वाले हमारे योद्धा माँ-बाप के नाम ये शेर लिखना चाहता हूँ।

“घर की इस बार मुक़म्मल में तलाशी लूँगा,
गम छुपा कर मेरे माँ-बाप कहाँ रखते थे “

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