फ़िल्म वीर ज़ारा का पोएटिक रिव्यु

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मैंने तुम्हारी ज़िंदगी के दो पल अपने पास रख लिए हैं और अपनी ज़िन्दगी के दो पल तुम्हें दे दिए हैं।

कहते हैं कि ज़िन्दगी में हम बस चार पल के मेहमान हैं। इसमें दो पल हम खुद के लिए बचाकर रखते हैं और दो पल उस शख़्स के नाम कर देते हैं जिससे हम बेइंतेहा मुहब्बत करते हैं। इन्हीं पलों में हम ज़िन्दगी के हर खूबसूरत एहसास को जीते हैं।
इन्हीं पलों में हम ज़िन्दगी को घटते बढ़ते देखते हैं ।

ऊपर लिखी लाइन वर्ष 2004 में रिलीज हुई फ़िल्म वीरज़ारासे ली गयी है। फ़िल्म की कहानी और निर्देशन का काम दिवंगत जाने माने डायरेक्टर और प्रोड्यूसर यश चोपड़ाजी ने किया है। वहीं फ़िल्म में बेहद ही कमाल गीतों को लिखने का श्रेय जावेद अख़्तरसाहब को जाता है और उन्हें लयबद्ध किया है लेट मदन मोहन जीने और संजीव कोहलीने सहयोग किया है।

फ़िल्म की स्टार कास्ट की बात करें तो आधा दर्जन कमाल के माने हुए कलाकारों ने इसमें भूमिकाएं निभाई है। मुख्य किरदार वीर प्रताप सिंहको जिया है शाहरुख खानने और ज़ारा हयात खानके रूप में प्रीति जिंटानज़र आईं हैं। वहीं रानी मुखर्जी, बोमन ईरानी, मनोज बाजपेयी, हेमा मालिनी, किरण खेर, अनुपम खेर और अमिताभ बच्चन जी ने इस फ़िल्म में गेस्ट भूमिका में अपनी मौजूदगी दर्ज़ करवाकर इसमें चार चाँद लगा दिए हैं।

 


कहानी शुरू होती है इंडियन एयर फोर्स के स्क्वाड्रन लीडर वीर प्रताप सिंहके एक रेस्क्यू मिशन के साथ जहाँ उनकी मुलाकात पाकिस्तानी ज़ारा हयात खानसे होती है। इस दौरान वीर, ज़ारासे उसकी जिंदगी का एक दिन माँग लेता है। क्योंकि वो उसे अपना गाँव और अपनी मेहमान नवाज़ी दिखाना चाहता है। दोनों इस बात से बिल्कुल बेखबर होते हैं कि ये एक दिन उनके लिए एक पूरी ज़िंदगी लेकर बैठा हुआ है।

हम सबकी ज़िन्दगी में ये पल ज़रूर आता है जब या तो हम किसी से उसकी ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा माँगते हैं या फिर वो शख़्स हमसे हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा माँग लेता है।
हम पूरी तरह से बेख़बर होते हैं कि कब ये थोड़ा सा हिस्सा आगे जाकर बड़ा रूप ले लेगा। हम बस एक अंजान मंज़िल की तरफ चल देते हैं बिना कुछ सोचे और उस सफ़र के दौरान हम कब थोड़ा थोड़ा करके उस शख़्स में घुल जाते हैं इसका अंदाज़ा हमें नहीं होता है।

जब वीरअटारी बॉर्डर पर ज़ाराको पाकिस्तान के लिए रवाना करता है तब उससे बोलता है कि-“हमेशा याद रखना की सरहद पार एक शख़्स है जो तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता है

जब बात दो ऐसे मुल्कों की हो जिनके बीच हमेशा से ही जंग चलती आई हो तब ऐसे मुल्क के दो लोगों को आपस में प्यार हो जाये तो ये उन लोगों के लिए किसी क़यामत से कम नहीं होता। लेकिन वो कहते हैं ना कि प्यार को भला कोनसी सरहदें अपने काबू में रख पाई हैं, क़ायनात खुद ब खुद उन लोगों को हमेशा के लिए एक कर देती है।

मुहब्बत में डूबे शख़्स से हमेशा एक सवाल जरूर किया जाता है, ” तुम उससे कितनी मुहब्बत करते हो?”
मुझे नहीं लगता आज तक कोई इस सवाल का ठीक ठीक जवाब दे पाया है। क्योंकि मुहब्बत कोई गणित का सवाल थोड़े है जिसे हम जोड़घटा कर बता दें या फिर उसका परसेंट बता सकें।

कहानी आगे बढ़ती है और वीरको पाकिस्तान में गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाता है। वो 22 साल तक जेल में एक नई पहचान क़ैदी नम्बर 786″ लेकर जीता है बस अपनी मुहब्बत की इज़्ज़त बचाने के ख़ातिर। वहीं दूसरी ओर ज़ाराको लगता है कि वीरकी मौत हो चुकी है और वो अपना मुल्क छोड़कर हिंदुस्तान आ बस्ती है।

कुछ मोहब्बतें ऐसी भी होती है जो बदले में कुछ नहीं माँगती बस अपना सब कुछ दे जाती है। ये दास्तान उन्हीं मोहब्बत की कहानियों की फेहरिस्त में अपना अलग मक़ाम रखती है। हमने बहोत सी कहानियाँ सुनी है, पढ़ी है जैसे लैलामजनूँ, हीरराँझा। वैसे ही मुझे लगता है ये कहानी भी ऐसी ही अमर कहानी है।

इस 22 साल में मानो वीरउस रात पर ही ठहरा हुआ था मगर ज़िन्दगी आगे बढ़ चुकी थी। इसी को फ़रहत एहसाससाहब का एक शेर नज़्र करता हूँ।

इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

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