फ़िल्म “मेरी प्यारी बिंदु” का पोएटिक रिव्यु…

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सूफ़ी सोहेल:
जयपुर

“प्यार करना बहुत लोग सिखाते हैं पर अफसोस उस प्यार को भुलाते कैसे हैं ये कोई नहीं सिखाता”.

हर इन्सान को उम्र के अलग अलग पड़ाव पर प्यार होता है। ऐसे में ज़ाहिर है प्यार के मायने भी हर इन्सान के लिए अलग अलग होते हैं। कुछ लोगों के लिए प्यार पा लेना सबसे बड़ा अचिवमेंट होता है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग प्यार को एक जिम्मेदारी समझते हैं और ये जिम्मेदारी जल्द ही उनके लिए बोझ का रूप ले लेती है। इस बोझ को वो तो खुद से दूर झटक देते हैं। लेकिन सामने वाला इन्सान उस एहसास को उस प्यार को कभी भुला ही नहीं पाता है।

ऊपर लिखी गयी लाइन साल 2017 में आई फ़िल्म “मेरी प्यारी बिंदू” से है जो हम सबको परिभाषित करती है। फ़िल्म के कहानीकार हैं “सुप्रोतिम सेनगुप्ता” और डायरेक्टर “अक्षय रॉय” हैं। फ़िल्म में म्यूजिक “सचिन-जिगर” की जोड़ी ने दिया है और कमाल के गाने लिखे हैं “क़ौसर मुनीर” ने।



फ़िल्म में “आयुष्मान खुराना” एक राइटर के रोल में हैं। वहीं “परिणीति चोपड़ा” एक सिंगर के रोल में नज़र आई हैं।

कहानी की शुरआत होती है ‘कोलकाता’ शहर से जिसे हम “सिटी ऑफ जॉय” भी कहते हैं। रोड पर दौड़ती हुई पीली टैक्सियाँ, आड़ी तिरछी बिछी ट्राम लाइन्स, लाल रंग की बिल्डिंग्स और रोसोगुल्ला जैसी मिठास लिए हुए लोग।

ऐसे ही एक बोरिंग से TUESDAY की दोपहर में “अभिमन्यु रॉय” की ज़िंदगी में प्यार बिना दस्तक दिए उसके पड़ोस में “बिंदू शंकर नारायण” के रूप में आ धमका और यहीं से इस भाग दौड़ वाले सफर की शुरुआत हो गई।

“अभिमन्यु रॉय” और “बिंदू शंकर नारायणन” की दोस्ती की शुरुआत करवाने में सबसे अहम रोल समोसे और हरी चटनी ने अदा किया। अब जैसा कि हर रिश्ते की शुरुआत दोस्ती से होती है और फिर वो स्टेप दर स्टेप प्यार के आखरी पड़ाव पर आ पहुँचता है।

बिल्कुल अमिताभ बच्चन के “कौन बनेगा करोड़पति” वाले खेल की तरह आखरी पड़ाव जहाँ पर सिर्फ एक मौका होता है जितने और हारने के बीच। बहरहाल, ठीक वैसा ही “अभिमन्यु रॉय” के साथ भी हुआ। उसे “बिंदू” से बेइंतेहा मुहब्बत हो गयी। वो खुदको समोसा और बिंदु को उसकी हरी चटनी मानकर अंदर ही अंदर खुश हो लेता था

वक़्त ने करवट पलटी “अभिमन्यु” अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर चुका था। वहीं “बिंदू” अपनी माँ को एक्सीडेंट में खो देने के बाद AUSTRALIA चली गयी थी।

ऐसे ही अचानक कुछ सालों बाद दोनों एक दिन गोवा में मिल जाते हैं। तब “बिंदू” बताती है कि उसने सगाई कर ली है। “अभिमन्यु” का दिल बिखर जाता है और वो खुद को कभी न बाहर आने वाले जोन में पाता है। जिसे हम ‘FRIENDZONE’ के नाम से जानते हैं।

वो कहते हैं ना कि “कुछ लोगों के रास्ते एक जरूर होते हैं लेकिन मंज़िल जुदा होती है”। कुछ ऐसा ही ‘अभिमन्यु’ और ‘बिंदू’ की कहानी में भी था। जहाँ उनके रास्ते एक जरूर थे लेकिन मंज़िल जुदा थी।

एक बार फिर “बिंदू” फोन करके “अभिमन्यु” को बताती है कि वो मुम्बई में है और उसने फिर से सगाई तोड़ दी है। “अभिमन्यु” उससे मिलता है और उसे संभालता है। फिर वो उसका सिंगर बनने का सपना पूरा करने में उसके साथ लग जाता है। इसी बीच वो एक दिन हिम्मत जुटाकर अपने प्यार का इज़हार कर देता है, जिसपर “बिंदू” अपने हाँ की मुहर लगा देती है।

“बिंदू” का एल्बम रिलीज होने के बाद “अभिमन्यु” उसको अपने घरवालों के सामने शादी के लिए प्रपोज़ करता है। जिसे बाद में “बिंदू” ये कहते हुए मना कर देती है कि उसे FUTURE में “अभिमन्यु” अपने साथ नहीं दिखाई देता है।

वो कभी उसकी 2BHK वाली लाइफ में फिट नहीं हो पाएगी। जरूरी नहीं कि हर टूटने वाली चीज आवाज़ करे। दिल जब टूटता है ना तो आवाज़ नहीं होती बस एक टीस, एक दर्द, नसों में, जिस्म में लगातार दौड़ता रहता है। ऐसा ही एक दर्द ‘अभिमन्यु’ की नसों में उस वक़्त दौड़ रहा था।

“ज़िन्दगी साइड A से साइड B की तरफ घूमती गानों की रील की तरह होती है। कभी कोई गाना पूरे दिन होंठों पर रहता है और कभी किसी गाने की सिर्फ धुन याद रह जाती है”।

हम लोगों ने अपनी ज़िंदगी में ना जाने कितने अनगिनत गाने सुने होते हैं। कुछ गाने बारिश की ठंडी बौछार का एहसास कराते हैं, तो कुछ गाने चेहरे पर सूरज की तपिश महसूस करवाकर लड़ाई ज़ारी रखने का हौसला देते हैं।

कुछ गाने एक अँधेरे कमरे के कोने में बैठकर आँसू बहाते हुए सुने जाते हैं, तो कुछ गानों को हम खुद ही SKIP बटन दबाकर आगे निकाल देते हैं। क्योंकि हम उन्हें किसी खास मौके के लिए अपनी प्ले लिस्ट में सेव कर लेते हैं। इसी फिल्म के एक गाने के बोल मुझे बड़े पसन्द हैं।

“फ़ूल जो बंद है पन्नों में
तुम उसको धूल बना देना,
बात छिड़े जो मेरी कहीं
तुम उसको भूल बता देना,
माना के हम यार नहीं
लो तय है कि प्यार नहीं”

‘बिंदू शंकर नारायणन’ आखिर में ‘अभिमन्यु रॉय’ से ये कहती है कि “प्यार के बारे में नया क्या कहा जा सकता है, लेकिन मुझे यक़ीन है तुम जरूर कुछ नया लिखोगे”। इस पर अभिमन्यु जवाब में सिर्फ इतना ही कह पाता है।

“HAPPY ENDINGS बिकते ज्यादा हैं”

मुझे राइटर्स से हमेशा यही शिकायत रही है कि वो कहानियों को एक “HAPPY ENDING” दे देते हैं। जबकि असल जिंदगी में में हर एंडिंग “HAPPY” नहीं होती।

कुछ ऐसे ही राइटर के नाम “जॉन एलिया साहब” का ये शेर पढ़ना चाहूँगा।

“उसकी उम्मीद-ए-नाज़ का हमसे ये मान था के
आप उम्र गुज़ार दीजिये, उम्र गुज़ार दी गयी”

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