फ़िल्म बरेली की बर्फ़ी का पोएटिक रिव्यु…

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“आसान नहीं है तुमसे प्यार करना मगर तुमसे प्यार ना करना उससे भी ज्यादा मुश्किल है”

एक प्रेमी कितने जतन करता है अपनी प्रेमिका से प्यार पाने के लिए। वो उसे ख़त लिखता है, उसके लिए गाने गाता है, उसका इंतज़ार करता है और वो उसके लिए शायर भी बन जाता है। बस एक काम जो वो नहीं कर पाता वो है “इज़हार”।

आपको ले चलते हैं साल 2017 की एक ऐसी ही फ़िल्म जिसका नाम है “बरेली की बर्फ़ी”। इस फ़िल्म को डायरेक्ट किया “अश्विनी अय्यर तिवारी” ने और कहानी उनके पति “नितेश तिवारी” ने लिखी है। फ़िल्म में काफी प्यारे गाने हैं जिन्हें विभिन्न म्यूजिक डायरेक्टर्स ने बनाया है।

फ़िल्म एक इंटरनेशनल नॉवेल “The Ingredients of Love” पर आधारित है। जिसके लेखक का नाम “Nicholas Barreau” है। फ़िल्म में “आयुष्मान खुर्राना” और “कृति सैनन” मुख्य कलाकार के रूप में है। वहीं “राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा” सहायक भूमिका में हैं।

वैसे तो बरेली शहर अभी तक दो ही चीजों के लिए प्रसिद्ध था। एक तो ‘बरेली का झुमका’ और दूसरी ‘बरेली की चुनावी सीट’। लेकिन अब बरेली अपनी बरफी के लिए भी जाना जाने लगा है।

प्यार में हारा इन्सान कभी कभी अपने हद से आगे का काम कर जाता है। ऐसा ही हमारे “चिराग दुबे”(आयुष्मान खुर्राना) जी के साथ भी हुआ। उन्होंने अपने पहले प्यार को हारने के बाद एक किताब लिख डाली “बरेली की बरफी” और सारा खेल यहीं से शुरू हो गया।

“बिट्टी मिश्रा”(कृति सैनन) जो हर बात पर सौ सौ की शर्त लगाने को तैय्यार रहती है। वैसे तो “बिट्टी” को रातभर घर से बाहर रहना, सिगरेट-दारू पीना, ब्रेक डाँस करना ये सब बड़ा ही पसंद है। जो कि हमारे भारतीय समाज अनुसार लड़कों के काम है। इसी कारण उसकी दो सगाई टूट चुकी है।

होता ये है कि वो अपना घर छोड़कर भाग रही होती है। जंक्शन पर ट्रेन के इंतज़ार में ये किताब खरीद लेती है। बस फिर क्या अपना प्लान त्याग कर उल्टे पाँव लौट आती है। किताब पर लेखक का नाम पढ़ती है “प्रीतम विद्रोही” (राजकुमार राव) और सोचती है कि एक शख़्स तो है जो उसे अच्छे से जानता है और उसे ऐसे ही पसंद करता है।

इसी चक्कर में ‘बिट्टी’ की मुलाक़ात ‘चिराग’ से हो जाती है। यहाँ से शुरू होता है चिट्ठियों का दौर जो प्यार की पहली सीढ़ी होता है। लेकिन ‘बिट्टी’ को ये नहीं पता कि इन चिट्ठियों और किताब के लेखक का नाम ‘चिराग दुबे’ है ना कि ‘प्रीतम विद्रोही’ है। वहीं दूसरी ओर ‘चिराग’ को ‘बिट्टी’ से प्यार हो जाता है। लेकिन वो दोस्ती टूट जाने के डर से इज़हार नहीं कर पाता।

‘बिट्टी’ की ज़िद के आगे ‘चिराग’ जी कितने दिन दीवार बनकर खड़े रहते। दीवार ढह गई और दुबे जी विद्रोही की घर वापसी करवाने के लिए खुद अपने जिगरी दोस्त ‘मुन्ना’ को लेकर निकल पड़े। उन्हेंने ‘प्रीतम विद्रोही’ को समझाया कि तुम्हें बस एक Badass Bauua बनकर ‘बिट्टी’ का दिल तोडना है जिसे बाद में वो जोड़ लेगा।

यह फ़िल्म मुझे पूरी तरह से एक मिडिल क्लास इश्क़ की कहानी लगती है। फ़िल्म में ‘चिराग दुबे’ वही मिडिल क्लास वाली स्टाइल में प्यार जताने की कोशिश करते हैं। जैसे कि ख़त लिखना लेकिन किसी दूसरे के नाम से, इज़हार नहीं कर पाना, एक अच्छा दोस्त बनकर रहना और लड़की के माता-पिता का पसंदीदा होना। मगर आज के जमाने में इन सबसे इश्क़ कहाँ मिल पाता है।

‘चिराग दुबे’ जी हवा में लाठी घुमाते हैं और वो लाठी उल्टी उन्हीं को आ पड़ती है। दरअसल ‘प्रीतम विद्रोही’ नापसन्द आने के बजाए ‘बिट्टी’ और उसके माता-पिता को पसन्द आ जाते हैं। अब कौन आशिक़ अपने महबूब को रक़ीब का होते देखना चाहेगा। इसीलिए ‘चिराग दुबे’ दूसरी तरकीब लगाकर ‘विद्रोही’ को सामने वाले कि नज़रों में गिरा देते हैं। यहीं से दोनों में कोल्ड वॉर शुरू हो जाता है।

“अगर शक्ल देखकर लड़कियाँ शादी करती ना तो हिन्दुस्तान के आधे लड़के कुँवारे होते”

‘प्रीतम विद्रोही’ अपनी ज़िन्दगी को ‘चिराग दुबे’ के हाथों मज़ाक बनते देखकर उसे चेतावनी दे जाता है कि अब वो ‘बिट्टी’ से शादी करके ही रहेगा। तब जाकर ‘चिराग’ को अपनी खुदगर्ज़ी का अंदाज़ा होता है। वो ‘विद्रोही’ से माफी माँगता है। अपना सारा इश्क़, सारा ग़म समेटकर एक सच्चे दोस्त की तरह वो सगाई में पहुँच जाता है।

कहते हैं ना कि अगर तुम्हारी नीयत सच्ची है तो तुम्हें वो चीज़ खुद-ब-खुद मिल जाएगी। कुछ ऐसा ही अंत में ‘चिराग दुबे ‘ के साथ होता है। वो ‘प्रीतम विद्रोही’ की तरफ से ‘बिट्टी’ के लिए एक चिट्ठी पढ़ता है जो उसने खुद लिखी होती है। उस चिट्ठी में वो सब कुछ सच सच पढ़ देता है कि वो कितना प्यार करता है।

ज़िन्दगी बड़ी अजीब है जब हमें लगता है कि हम बाज़ी हार चुके हैं तभी अचानक शतरंज के खेल की तरह पलट जाती है। कहानी पलटती है और ‘बिट्टी’ गले लगती है ‘चिराग दुबे’ से। तब उसे पता चलता है कि उसके साथ खेल चल रहा था। ‘बिट्टी’ को सच पहले से ही पता था बस वो उससे सुनना चाह रही थी।

ऐसी ही कुछ सच्ची मोहब्बत की कहानियों के नाम “बशीर बद्र” साहब का ये शेर।

“मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा
तुम्हारी मुहब्बत अगर साथ होगी”

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