सुशांत सिंह राजपूत की आख़िरी फ़िल्म का पोएटिक रिव्यु

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17-अगस्त-2020   

जन्म कब लेना है और मरना कब है ये हम डिसाइड नहीं कर सकते पर जीना कैसे है ये हम डिसाइड कर सकते हैं।

हमारे हाथ में ज्यादा कुछ नहीं होता सिवाय एक चीज़ के वो है कोशिश। हम हर चीज़ के लिए ज़िन्दगी में कोशिश करते हैं। पैदा होने के बाद बोलने और चलने की कोशिश, फिर चीज़ें याद रखने और समझने की कोशिश, फिर जल्दी बड़े होने की कोशिश और इसी तरह हम हर रोज़ अपनी ज़िंदगी जीने की कोशिश करते हैं।

दरअसल यहाँ बात हो रही है हालिया रिलीज हुई फ़िल्म दिल बेचाराके बारे में जिसका निर्देशन किया है मुकेश छाबड़ाने , गीत लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्यने और उन गीतों को संगीत ए आर रहमान साहबने दिया है। इसमें मुख्य क़िरदार के रूप में सुशांत सिंह राजपूतऔर संजना सांघीनज़र आये हैं

जॉन ग्रीनके द्वारा लिखी गयी इंटरनेशनल बेस्ट सेलर नॉवेल “The Fault in Our Stars” का ये हिंदी रूपांतरण है। ये फ़िल्म कई मायनों से खास है क्योंकि ये दिवंगत बॉलीवड एक्टर सुशांत सिंह राजपूतकी आखरी फ़िल्म थी वहीं संजना सांघीऔर डायरेक्टर मुकेश छाबड़ाकी पहली फ़िल्म है।

कहानी की शुरुआत होती है कीज़ी बासुके साथ जितना अतरंगी ये नाम है उतनी ही अतरंगी इंसान ये है। फिर एंट्री होती है राजकुमार इम्मानुएल जूनियरइन शॉर्ट मैनीकी जो एक जिंदादिल इंसान है। जिसका सपना एक दिन सुपरस्टार रजनीकांतजैसी फ़िल्म बनाने का है। यहाँ से शुरू होती है फिर एक था राजा एक थी रानीवाली कहानी।

किजीऔर मैनीदोनों को ही कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी है। जहां किजीहमेशा खुद की बीमारी और खुद को लेकर सीरियस रहती है। वहाँ मैनीज़िन्दगी को बिल्कुल हल्के में एन्जॉय करता है एक दम खुलकर। एक दिन वो उसे बोल देता है कि उससे वो बेहद प्यार करता है और उसे वो अपना बॉयफ़्रेंड बना ले।



ज़िन्दगी कहाँ किसकी आसान हुई है। जब तक ज़िन्दगी हर मोड़ पर आपका इम्तिहान ना ले तब तक जीने में मज़ा ही कहाँ है। लेकिन जब आपके सपनों, आपकी ख्वाहिशों की फहरिस्त इतनी लंबी हो कि उन्हें मुक़म्मल करने का आपके पास वक़्त ही ना बचा हो तो फिर ज़िन्दगी एक सज़ा लगने लगती है। एक ऐसी सज़ा जिसे बस आप जल्द से जल्द पूरा कर छुटकारा पा लें।

“किजी” हर मुसीबत से मुकाबला कर पेरिस पहुँच जाती है जब उसे पता लगता है कि उसका फेवरेट सिंगर ‘अभिमन्यु वीर’ वहाँ है और उससे बस एक सवाल करती है।
“तुम्हारा लास्ट गाना अधूरा क्यों था?”

इसका जवाब ‘अभिमन्यु’ सिर्फ़ इतना ही देता है।
“गाना इसलिए अधूरा था क्योंकि ये लाइफ ही अधूरी है”

अधूरा गाना, अधूरी बातें, अधूरे ख़्वाब, अधूरी यादें, अधूरा शख़्स इन सबसे ज्यादा पूरा और खूबसूरत कोई नहीं। एक अधूरापन ही तो है जो हर चीज़ को हर शख़्स को पूरा करता है और उसे खूबसूरत बनाता है। जब दो अधूरे मिलेंगे ही नहीं तो वो साथ में पूरा कैसे होंगे। हम सबके अंदर हमने वो ‘अधूरापन’ कहीं ना कहीं बचाकर रखा हुआ है।

आख़िर में होता वही है कैंसर एक दिन “मैनी” को अपने साथ ले जाता है। बस उसका अधूरापन रह जाता है। जिसे किजी खुद में समेटकर खुद को पूरा कर लेती है।

मुझे “कैफ़ी आज़मी” साहब का एक शेर याद आ रहा है जो इसे चरितार्थ करता है।

“रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई”

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