सुफना बेटा जब स्वाद आने लग जाये तो समझ जाना कि तुम सही राह पर चल रहे हो

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31 जुलाई 2020 

सुफनाका मतलब ही होता है पूरी तरह से फना हो जाना।
किसी के इश्क़ में फ़ना हो जाना या किसी के लिए अपनी जान फ़ना कर देना।

मैं बात कर रहा हूँ पंजाबी सिनेमा की फ़िल्मसुफनाके बारे में, जो इसी साल 14 फरवरी यानी कि वैलेंटाइन्स डे वाले दिन रुपहले पर्दे पर हमसे रूबरू हुई। जिसका निर्देशन किया हैजगदीप सिद्धूने और इसमें मुख्य भूमिकाएम्मी विर्कऔरतानियाने निभाई है।

ये मूवी जिस तरह से रुई के खेतों से शुरू होती है, बिल्कुल वैसा ही रुईनुमा इश्क़ इसमें दिखाया है। एक दम रुई जैसानर्म और मासूमइश्क़ दर्शाया गया है। किस तरह एक लड़का रुई के खेतों में काम करने वालीतेगनाम की लड़की से इश्क़ कर बैठता है। इश्क़ ही नहीं करता बल्कि उससे इज़हार भी कर बैठता है। इसके बाद शुरू होती है असल कहानी।

जो क़ाबिलियत पंजाबी फिल्में रखती है इश्क़ को असाधारण तरीके से खूबसूरत बनाकर पेश करने में, मुझे नहीं लगता इतनी सरलता से इश्क़ को दूसरा सिनेमा बयान कर पाता है। एक सीधी साधी कहानी शुरू होती है, फिर उसमें इश्क़ का तड़का लगता है और फिर वो अपनी अलग ही खुशबू छोड़ जाती है। बिल्कुल वैसी ही सौंधी खुशबू जो बारिश होने पर मिट्टी से आती है।

फ़िल्म का जादू ही कुछ ऐसा है कि इससे आप पूरी तरह जुड़ जाते हो। उसके बाद आप फ़िल्म की हर छोटी से छोटी चीज़ के बारे में सोचने लगते हो। फिर चन्द घण्टों बाद आपका मन कचोटने लगता है, आप महसूस करते हो कि ये कहानी तो आपकी है। उस पूरी रात आप ये सोचते हो कि मुझे भी तो ऐसा हीनर्म और मासूमइश्क़ ही चाहिए।

मुझे इस फ़िल्म का एक सीन याद आता है जिसमें एक बाबाजी सेएम्मी विर्कपूछ रहे होते हैं कि:- ” पता कैसे चलेगा मुझे इश्क़ है या नहीं?”
बाबाजी मुस्कुराते हैं और बोलते हैंबेटा, जब स्वाद आने लग जाये तो समझ जाना कि तुम सही राह पर चल रहे हो

जब भी कभी किसी इंसान को प्रेम होता है तो उसे बिल्कुल ऐसा ही स्वाद आने लगता है। फिर उसे ना भूख लगती है और ना ही प्यास लगती है। फिर उसे कपास में भी गुलाब की खुशबू आने लगती है और ठंड में भी गर्मी लगने लगती है।

जैसे वो परांठों पर मक्ख़न लगाने से उसका स्वाद बढ़ जाता है। ठीक उसी तरह का मक्खन इस फ़िल्म मेंबी प्राकऔरजानीके गानों ने लगाकर इसका स्वाद बढ़ा दिया है।
कुछ गानों का स्वाद तो ऐसा है कि एक बार लग जाये तो फिर उतरना मुश्किल है। मानो जैसे किसी वीरान रेगिस्तान में बमुश्किल एक पेड़ मिल गया हो। फिर उसके नीचे बैठकर बड़े सुकून से इसके गीत लिखे गए हों।

ऐसे ही इश्क़ को बयाँ करने के लिए मुझेग़ालिब साहबका एक शेर याद हो आया है:-

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता, दुआ क्या है।।

सूफ़ी सोहेल

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