मैं ओहनू हाँ नहीं करांगी पापा- पंजाबी फ़िल्म क़िस्मत का पोएटिक रिव्यु

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10-अगस्त-2020    

कहते हैं कि एक बेटी अपने पिता का स्वाभिमान होती है। उसे अपने साथ साथ अपनी घर की मर्यादा का भी ख़्याल रखना होता है। एक बेटी जन्म से ही अपने कंधों पर अनेक जिम्मेदारियाँ लेकर चलती है और इनके ख़ातिर वो अपने सपने भी क़ुर्बान कर देती है।

ये ऊपर लिखी लाइन पंजाबी सिनेमा की 2018 में रिलीज़ हुई फ़िल्म “किस्मत” से है। फ़िल्म का लेखन और निर्देशन ‘जगदीप सिद्धू’ ने किया है। फ़िल्म में ‘बी प्राक’ ने म्यूजिक दिया है और ‘जानी’ ने एक से एक बेहतरीन गीत लिखे हैं। मुख्य किरदार ‘शिवजोत सिंह गिल’ की भूमिका में जहाँ ‘एम्मी विर्क’ हैं वहीं ‘बानी’ की भूमिका ‘सरगुन मेहता’ ने निभाई है। 


कहानी शुरू होती है शिवजोत सिंह गिलके साथ जो लगातार फेल होने के कारण अपनी ग्रेजुएशन पूरी नहीं कर पा रहा है।इसलिए उसके घरवाले उसकी शादी कर देना चाहते हैं ताकि वो अपनी ज़िंदगी के प्रति ज़िम्मेदार बन सके। भारतीय समाज का मानना है कि शादी करने से जब दोहरी ज़िम्मेदारी सर पर पड़ती है तो इंसान को खुद ब खुद दुनियादारी समझ आ जाती है।

जैसे तैसे वो शादी स बचकर चंडीगढ़ जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए घर वालों को राज़ी कर लेता है। तब वहाँ उसकी मुलाकात पास वाले अपार्टमेंट में रहने वाली बानीसे होती है और उसे प्यार हो जाता है।

मुझे ऐसा लगता है कि बारिश और प्यार दोनों आपस में जुड़वा है। क्योंकि जब भी कभी बादल छाते हैं तो हम उम्मीद करते हैं कि बारिश होगी लेकिन तब नहीं होती। ठीक वैसे ही प्यार भी तब नहीं होता जब हम चाहते हैं। बल्कि ये चुपचाप बिना बताए बेमौसम बारिश की तरह हो जाता है।

गिलका लिखा हुआ प्रेम पत्र बानीके पिता के पास पहुंच जाता है, जो कि थाने में S.H.O की पोस्ट पर हैं। वो गिलको अपने थाने बुलाते हैं और बोलते हैं कि वो बानीको भूलकर अपने गाँव लौट जाए।

ज़माने में सबसे बड़ा दुःख है तो वो है किसी खास से बिछड़ने का दुःख, जिससे हम बेइंतेहा मुब्बत करते हैं। इस अलगाव की टीस ताउम्र एक काँटे की तरह चुभती रहती है। खैर, गाँव जाते वक्त जब बानीगले लगना चाहती है तो उसे गिलये कहते हुए रोक देता है:-

जे तू गले लगी ना ते फिर तेनु गाड़ी विच बिठाके ले जाना है मैं

इसी फिल्म में जानीके लिखे गीत की पंक्ति इसी दर्द को बयाँ करती है।


जे तू नहीं ते फिर मेरे कोल कौन होएगा
रूह मेरी तड़पेगी जानी दिल भी रोएगा

दुनिया में अगर एक बाप किसी के आगे झुकता है तो वो सिर्फ़ ओ सिर्फ़ अपनी बेटी के आगे ही झुकता है। कहानी मोड़ लेती है गिलके ग़म में बानीडिप्रेशन में चली जाती है और अपने आखरी दिनों को अस्पताल में गिन रही होती है। तब उसके पिता गाँव जाकर गिलको सारा हाल समझते हैं और उसे मिलवाने के लिए ले आते हैं। कुछ ही दिन में बानीहमेशा के लिए अलविदा कह जाती है।

इश्क़ है ही ऐसा रोग जब होता है तो लोग समझ नहीं पाते और जब लोग समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। बिछड़ने के इसी दुःख पर अहमद फ़राज़साहब का एक शेर याद आ रहा है।

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फ़ूल किताबों में मिले

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