महरौली शहर की दास्ताँ…

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मेहर की पायल की छनक से पूरा महरौली शहर गुलज़ार था ! वो महरौली शहर की सबसे मशहूर गाने वाली थी ! दिखने में ऐसी की रातों की नींद उड़ जाए ! ख़ूबसूरती की इन्तहां थी वो ! आशिक़ों की उसे कोई कमी नहीं थी, दिन रात लोग उसकी एक-झलक पाने को बेताब रहते थे !

लेकिन ये बात उसके कई चाहनेवालों को नागवार गुज़रती थी ! लोगो ने उसे पाने के लिए हर तरह के जतन कर लिए थे, लेकिन वो थी की वो किसी के हाथ ना आई ! लेकिन एक शख्स था जिसके इश्क़ में वो गिरफ़्तार हो चुकी थी ! वो शख्स था एक नौजवान शायर जिसने मेहर को दीवाना बना रखा था, मेहर दिन-रात बस उसके ही सपने देखा करती थी !

वो दोनों हमेशा बस एकांत की तलाश में रहते जहाँ उन्हें दो पल सुकून भरे मिल जायें !

वो बावली के आस-पास बैठकर अपने मुस्तक़बिल के बारे में सोचते, और एक दूसरे को ढेर सारे वादे करते हुए चूम लेते थे ! एकबार एक सेठ ने उन दोनों को ऐसा करते हुए देख लिया था, मेहर को सेठ बड़ी ही घटिया निग़ाह से देखता था, उसने सोचा मौका अच्छा है, इस बार शायद वो मेहर को डरा-धमका कर मना लेगा !

वो अगले दिन मेहर के पास गया और उसे कहा देखो तुम मेरी बन जाओ नहीं तो मैं तुम्हें बदनाम कर दूंगा ! मैं जानता हूँ तुम सर्द रातों को उस जवान लौंडे के साथ गुलछर्रे उड़ाती हो ! मेहर जानती थी, कि वो सेठ उससे आख़िर चाहता क्या है ! मेहर ने अपनी आवाज़ को ऊँचा किया और कहा, सेठ अगर तुम्हें ये लगता हो की मेरे पाक़-साफ़ इश्क़ को ख़राब कर दोगे तो ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है !

सेठ ने कहा ठीक है, बड़ा गुमाँ हैं ना तुझे अपनी सूरत पर, देख कैसे मिट्टी में मिलाता हूँ तुझे !

मेहर ने बड़े ही प्यार से कहा,

इश्क़ ख़ुदा है, तू ख़ुद मिट्टी में मिल जाएगा, और तेरा निशां भी नहीं मिलेगा !

सेठ गालियाँ देते हुए मेहर के कोठे से बाहर निकल आया ! कुछ दिन यूँ ही तमाम् हुए, मेहर और उसका आशिक़ यूँ ही नए-नए ठौर तलाशते हुए अपना इश्क़ परवान चढ़ाते रहे !

कभी झुमका गिराकर मेहर बस क़दमों के निशाँ बनाते हुए आगे निकल जाती थी, और उसका आशिक़ उसके पीछे मेहर के क़दमों के निशाँ पर कदम-ब-कदम चला आता था ! पानी के सोतों पर रुककर वो दोनों अटखेलियाँ किया करते थे, उनका इश्क़ ऐसा हो चला था की परिंदे भी उनको देखने लगते थे !                        

एक दिन शहर में अफ़रा-तफरी मच गई, मेहर ने भी अपने मेहराब से नीचे झाँककर देखा तो एक सेठ मेहर की चौखट के आगे खड़ा होकर उसे गालियाँ सुना रहा था ! कह रहा था इन नाचने-गाने वाली औरतों की वज़ह से हमारी औरतें ख़राब हो रही हैं, ये औरत अपने आशिक़ के साथ घूमती है, और सरेआम उसे चूमती है !

इन कोठेवाली औरतों ने हमारी संस्कृति बिगाड़ दी है ! सेठ का लोगो ने साथ देना शुरू कर दिया, फिर उसी में से किसी ने बीच में कहा जाओ इसके उस आशिक़ को भी पकड़कर यहाँ ले आओ ! मेहर नीचे दौड़कर आई, उसका आशिक़ भी वहीँ खड़ा था, दोनों एक दूसरे को देख रहे थे !

तभी किसी ने पत्थर चला दिया जो सीधा मेहर को जा कर लगा ! मेहर पत्थर लगते ही बेहोश हो गई !  इधर भीड़ ने अपना फ़ैसला कर दिया था, उसके आशिक़ को पत्थरों से पीटकर मार डाला गया ! सबके चले जाने के बाद मेहर को होश आया, उसने देखा उसके सामने उसके आशिक़ की लाश पड़ी है !

मेहर ये देखकर बिलकुल टूट सी गई मगर उसने तय कर लिया था की वो ऐसे ख़ामोशी से नहीं जायेगी ! मेहर ने एक गीत तैयार किया, “मैं अपने ग़मों को लेकर कहाँ जाऊं” !  

मेहर ने शहंशाह से गुज़ारिश की एक जलसा रखवाया जाए, शहंशाह मेहर के मुरीद थे, तो उन्होनें बात मान ली ! जलसा शुरू हुआ और मेहर ने गाना शुरू किया, ऐसा लगा जैसे वहां खड़े सभी लोगों की आँखों से आँसू सैलाब बनकर निकल रहे थे !

मेहर ने जलसे को अपने हुनर से लूट लिया, महफ़िल में सभी लोग वाह किये जा रहे थे ! किसी को नहीं पता था की अगले पल क्या होने वाला था !

जलसा ख़त्म हुआ, लोग अपने घरों को लौट गए !

मेहर घर आई और उसनें फाँसी लगाकर ख़ुद को ख़त्म कर लिया, सेठ को भी ये बात पता लगी तो उसने मगरमच्छ के आँसू गिराए !

इस बात को कुछ महीनें बीत गए थे, लोग अब मेहर और उसके आशिक़ को अब भूल चुके थे

सेठ की बस एक बेटी थी, उसकी शादी की उम्र हो चली थी, सेठ चाहता था, की उसकी शादी धूमधाम से हो ! मगर शायद क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था !  मगर सेठ की बेटी बावली के मज़दूर से इश्क़ कर बैठी !

सेठ को पता चल गया, उसने फ़िर अपनी बेटी को क़ैद करवा दिया, बेटी एक दिन अपने माशूक़ के साथ अपने घर से निकल गई, और बावली की छत से कूद कर अपनी जान दे दी !

यहाँ की हवा में आज भी उन दोनों जोड़ों की खिलखिलाहट सुनाई देती है, दोनों मरकर भी अमर हो गए ! पास में ही उन चारों की कब्र हैं, जहाँ प्यार करने वाले लोग दूर-दूर आते हैं, और उन चारों की कब्र पर दिया जलाते हैं !

मेहर की बात सच साबित हुई, सेठ का कोई ठिकाना आज तक नहीं मिल पाया है !  

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