बारिशें

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ये एक काल्पनिक कहानी है जिसे लिखा है सूफ़ी सोहेल ने” I  

ये बारिश, बारिश की कुछ बूँदें और तुम।
मानो जैसे इन तीन शब्दों में मैंने अपना सब कुछ बयाँ कर दिया हो।

उसे बारिश में भीगना पसंद था और मुझे वो।

मुझे बारिशों में इतनी दिलचस्पी नहीं थी, पर उसके एक फ़ोन करने पर मैं बिना कुछ सोचे समझे, भीगता हुआ उसके घर पहुंच जाया करता था। क्योंकि उसे मुझसे बारिश में नाचते हुए अपनी तस्वीरें जो खिंचवानी होती थी।

सुबह से ही तबियत कुछ नासाज सी थी मेरी और आज फिर से मौसम को दखकर लग रहा था कि बारिश होने वाली है।
इतने में फोन की घंटी बजी और फ़ोन उठाने के साथ ही दूसरी तरफ से आवाज़ आयी
क्या यार सुबह से इंतेज़ार कर रही हूँ आखिर कब बारिश होगी।मेरा बारिश में नाचने का बहुत मन कर रहा है।अच्छा सुन जल्दी से मेरे घर पहुंच जा।

यार आज मैं नहीं आ सकूँगा, मेरी तबियत ठीक नहीं है।

इतना सुनते ही वो गुस्से से बोली, ” हाँ ठीक है, तेरा हर बार का यही बहाना है, ध्रुव , तू मत आना। और फोन काट दिया।

शायद उसके घरवालों ने उसका नाम बिल्कुल सही रखा था– “मयूरी

वो जैसे बारिश में अपने परों को लहराकर मोर नाचते हैं ना या वो बारिश के बाद आसमाँ में जो सात रंग दिखाई देते हैं।
ठीक वैसे ही सारी कलाएँ, सारे रंग मानो जैसे उसने खुद के अंदर बड़े ही सहज तरीके से समेट लिए हों।
लेकिन शायद उसे ये नहीं पता था कि उसने एक बेरंग इंसान
की जिंदगी में इतने रंग भर दिए हैं।

कुछ अलग ही अंदाज़ था उसका रूठे हुए को झठ से मना लेती थी, रोते हुए को हँसा देती थी, अंजान लोगों को भी अपना बना लेती थी और बातों में तो वो सबकी उस्ताद थी।

चेहरे पर उसके एक अलग ही नूर था, आँखों में किसी शोर से पहले की खामोशी और लबों पर एक दिलकश कहानी थी।
जब ज़ुल्फें लहराती थी तो लगता था कोई ठंडी पुरवाई चल रही हो।

एक बार कोई उसके साथ वक़्त गुज़रने बैठ जाए तो पता ही नहीं चलता था कि कब सुबह से शाम और कब शाम से सुबह हो गई। कुछ ऐसी ही थी वो सबसे अलग सबसे अलहदा।

एक बार किसी शाम उसने ऐसे ही मुझसे पूछ लिया कि– ‘ध्रुवतुम्हें पता है तुम्हारे नाम का मतलब क्या है?’

ये कैसा सवाल है मयूरी“?

मतलब ऐसे उल्टे सीधे सवाल करके मुझे तंग करना उसकी आदत थी। पर वो आज कुछ उदास सी लग रही थी। आज बात कुछ और ही थी, यही परेशानी मुझे खाये जा रही थी।

इतने में कुछ सोचते हुए अपने ही अंदाज़ में आसमाँ की तरफ इशारा करते हुए वो बोली कि, “तुम वो ध्रुव तारे हो जो आसमान में सबसे ज्यादा चमक रहा है। जिसे देखकर हर कोई उसे पाना चाहता है पर वो किसी के हाथ नहीं आता।

 

तब मैंने पूछा कि तुम्हारा मतलब क्या है?

फिर मुझे बड़े ही प्यार से समझाते हुए बोली कि-” तुम मेरी जिंदगी में उस ध्रुव तारे की तरह हो, जो अपनी रोशनी से मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाता है।

अच्छा और तुम्हारे नाम का क्या मायना है?

पहले तो वो बहुत खुश हुई पर फौरन ही उदास होकर बोली कि – ‘ मैं वो मोर हूँ जो बारिश होने पर अपने परों को लहराकर आसमान की ओर देखते हुए खुशी से नाचता है इस चाहत में की एक दिन वो आसमान जरूर छुएगा। पर फिर उसे लगता है कि वो आसमान कभी छू नहीं पाएगा और उसे छूने की ख्वाहिश में दर दर भटकता है।

ठीक उस मोर और आसमान की तरह हम दोनों भी कभी एक नहीं हो पाएंगे। मैं नहीं चाहती कि तुम मुझे पाने की चाहत में दर दर भटकते रहो।ये बोलकर वो वहाँ से चली गई।

इतना सुनते ही मैं सुन्न हो गया। ऐसा लगा कि मैं कोई हसीन ख़्वाब देख रहा था और किसी ने मुझे बुरी तरह झकझोर दिया हो।

वहाँ बैठकर मैं खुद से ही ये कहने लगा कि
काश! काश! काश! तुमने अपना फैसला सुनाने से पहले मुझसे एक दफ़ा अपना हालदिल तो पूछ लिया होता। मैं तुम्हें बता पाता कि जिसे तुम अपनी जिंदगी की डायरी का महज एक पन्ना समझ रही हो। उसने तुम्हें अपनी जिंदगी की वो डायरी माना है जिसे उसका लेखक बेतहाशा मुहब्बत करता है और ताउम्र उसे अपने पास सहेजकर रखता है। इस चाहता में की एक दिन वो उस डायरी के खाली पड़े सफेद पन्नों पर रंग बिरंगी स्याही से बेहतरीन कहानियाँ लिखेगा ।

खैर,
अब जब भी बारिशें आती है, अपने साथ तुम्हारी यादें भी ले आती है,
अपने दिल के मकाँ से तुम्हारे ख्याल अब निकाल देता हूँ मैं,
अक्सर अब बारिशें यूँही गुज़ार देता हूँ मैं।।

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