नोस्टाल्जिया फ़िल्म रिव्यु: कल हो ना हो…

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“जियो, मुस्कुराओ, खुश रहो, क्या पता कल हो ना हो”

हम सब अपनी अपनी जिंदगियों में इतना मसरूफ हो गए हैं कि हम लोग खुलकर मुस्कुराना तक भूल गए हैं। हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ हमें ये भी नहीं पता कि हमारे साथ अगले पल क्या होगा? लेकिन हम फिर भी आने वाले कल की चिंता में लगे रहते हैं। इस उलझन में हम अपने आज में जीना लगभग भूल चुके हैं।

मैं बात कर रहा हूँ साल 2003 में रिलीज़ हुई फ़िल्म “कल हो ना हो” के बारे में। जिसका निर्देशन ‘निखिल आडवाणी’ ने किया है और फ़िल्म को “करण जौहर” ने लिखा है। फ़िल्म में एक से एक बा क़माल गानों को “जावेद अख़्तर” साहब ने अपनी क़लम से नवाज़ा है। वहीं इन गानों को म्यूजिक “शंकर-एहसान-लोय” की तिकड़ी ने दिया है।

फ़िल्म की कहानी शुरू होती है न्यू यॉर्क शहर में रहने वाले कपूर परिवार की “नैना कपूर”(प्रीति जिंटा) के साथ। “नैना” के पिता ने खुदकुशी कर ली थी। जिसकी वजह से उसकी दादी और माँ में झगड़ा होता रहता है। “नैना” का एक बहुत ही अच्छा दोस्त “रोहित पटेल”(सैफ अली खान) है और दोनों साथ में MbA की क्लास जाते हैं।

जब जिंदगी में परेशानियाँ, गुस्सा, खुद से नाराजगी होती है। तब हम ऊपरवाले से दुआ करते हैं कि काश कोई ऐसा इन्सान हमारी ज़िंदगी में आ जाये जो हमें फिर से जीना , मुस्कुराना सीखा दे। कभी ऐसा होता भी है कि एक इन्सान आता है जो हमारी पूरी ज़िंदगी बदल देता है।

“नैना” को ख़बर नहीं थी कि उसके लिए भी एक ऐसा इन्सान है जो एक दिन आकर उसकी हर परेशानी दूर कर देगा। वो इन्सान आता है “अमन माथुर”(शाहरुख खान) के रूप में और देखते ही देखते वो सब कुछ बदल देता है। वो हर इन्सान को अपना बना लेता है, वो सबको जीना सिखाता है। “नैना” को तो वो पुरानी “नैना” से मिलवाता है जो बहुत पहले कहीं खो गयी थी।

ऐसा इन्सान हम सबकी ज़िन्दगी में आता है। तब फिर 2 ही चीज़ें होती हैं या तो हम उस इन्सान से बेपनाह मुहब्बत कर बैठते हैं या फिर बेइंतेहा नफरत कर बैठते हैं। क्योंकि हमें पता होता है कि ये कुछ वक्त के बाद हमें फिर से अकेला छोड़ कर चला जाएगा।

“कोई पागल ही होगा जो तुमसे प्यार नहीं करेगा, नैना”

“नैना” बेपनाह मुहब्बत कर बैठती है और “अमन” भी नैना से मुहब्बत करता है। दरअसल, कभी कभी किस्मत मेहरबान नहीं रहती। जो इन्सान सबसे ज्यादा ज़िन्दगी से भरा होता है। जो हर पल जीना चाहता है उसी के पास ज़िन्दगी कम बची होती है। “अमन” के साथ भी ऐसा ही होता है उसके पास बस चन्द महीने की ज़िंदगी बची होती है।

इस फ़िल्म के एक गाने के बोल मुझे बड़े ही पसंद है।

“चाहे जो तुम्हें पूरे दिल से
मिलता है वो मुश्किल से
ऐसा जो कोई कहीं है
बस वो ही सबसे हसीं है
उस हाथ को तुम थाम लो
वो मेहरबाँ कल हो न हो”

“प्यार का पहला कदम दोस्ती है और आखिरी भी बस बीच के कदम रह गए हैं”

“रोहित” ये बात “नैना” को बताता है और अपने प्यार का इज़हार कर देता है। जब “अमन” को ये बात पता चलती है तो वो अपने प्यार की कुर्बानी देकर बस “नैना” को खुश देखना चाहता है। वो उन दोनों को एक दूसरे से प्यार करवाने को अपनी ज़िंदगी मान लेता है। आख़िर में वो दोनों की शादी करवाकर अपनी ऑंखें हमेशा के लिए बंद कर लेता है।

ऐसे ही प्यार में क़ुर्बानी देने वालों के नाम “जावेद अख़्तर” साहब का ये शेर पेश है ।

“हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा”

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