“नमाज़ में वो थी और लगा दुआ हमारी क़ुबूल हो गयी”

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फ़िल्म राँझना का पोएटिक रिव्यु I

“सूफ़ी सोहेल”

“नमाज़ में वो थी और लगा दुआ हमारी क़ुबूल हो गयी”

मुहब्बत का नशा ही ऐसा है अगर सर चढ़ जाए तो फिर इन्सान लाख कोशिश कर ले उतारे नहीं उतरता। कहते हैं कि सच्ची मुहब्बत किसी इबादत से कम नहीं। जब किसी को मुहब्बत बिन माँगे ही अता हो जाये तो यकीनन उस शख़्स पर ऊपरवाले का हाथ है।

बात हो रही है फ़िल्म “राँझना” के बारे में जो साल 2013 की सफल फिल्मों में से थी। फ़िल्म के डायरेक्टर “आनंद एल रॉय” और लेखक “हिमांशु” की जोड़ी ने एक खूबसूरत फ़िल्म पेश की। फ़िल्म में आँखों को ठंडक पहुँचाने वाले गाने लिखे हैं “इरशाद क़ामिल” जी ने और उन गानों को संगीत देकर “ऐ आर रहमान” साहब ने पूरा किया है।

फ़िल्म में मुख्य कलाकारों की भूमिका में “धनुष”, “सोनम कपूर” के साथ साथ “स्वरा भास्कर” और “ज़ीशान अय्यूब खान” भी नज़र आये हैं। वहीं “अभय देओल” गेस्ट भूमिका में हैं। बॉलीवुड में ये साउथ स्टार “धनुष” की पहली फ़िल्म थी जिसमें उन्होंने अपने अभिनय का जादू बिखेरा।

कहानी शुरू होती है एक बेहद खूबसूरत शहर “बनारस” के साथ। जितना प्रसिद्ध ये शहर अपने घाटों और गंगा नदी को लेकर है। उतना ही प्रसिद्ध ये प्रेम कहानियों के लिए भी है। कुछ लोग यहाँ अपने लिए सुकून तलाशते हुए पहुँचते हैं, तो कुछ लोगों को ये शहर खुद बुला लेता है। “ज़ोया” और “कुंदन” के साथ एक ऐसी ही प्रेम कहानी ने यहाँ जन्म लिया।

मेरे ख़्याल से इश्क़ की तीन सीढियाँ होती है। पहली सीढ़ी पर होता है एक दम मासूम और नादान इश्क़, दूसरी सीढ़ी पर होता है जोश, आक्रोश और निडरता वाला इश्क़। वहीं तीसरी और आखरी सीढ़ी पर होता है आपसी समझ और भरोसे वाला इश्क़। जैसे जैसे हम उम्र के पड़ाव पार करते जाते हैं वैसे वैसे हमारे लिए इश्क़ के मायने बदलते जाते हैं।

हमारे “कुंदन” बाबू पहली सीढ़ी पर कदम रख चुके थे। उन्हें पहली ही नज़र में “ज़ोया” से इश्क़ हो गया था। इश्क़ ऐसा की पंद्रह दिनों तक थप्पड़ खाने के बाद “ज़ोया” का नाम जानने को मिला। “ज़ोया” के घरवालों को जैसे ही इसकी खबर लगी उन्होंने उसे तुरंत बनारस से बाहर पढ़ाई के लिए रवाना कर दिया। वहीं “कुंदन” बाबू आशिक़ों का सबसे पसंदीदा काम करने लगे ‘ अपने महबूब के लौट आने का इंतज़ार”।

पूरे 8 साल बाद “कुंदन” के सूखे जीवन में मानो सावन लौट आया हो। आठ साल के बाद “ज़ोया” वापिस बनारस लौटी थी। परेशानी ये थी कि उसने “कुंदन” को पहचाना ही नहीं। जितना दुःख मुहब्बत में नहीं मिलता उससे कहीं ज्यादा दुःख तब होता है जब आपका महबूब आपको ही ना पहचाने।

“ज़ोया” के घरवाले उसके आने की खुशी में एक प्रोग्राम रखते हैं। जिसमें उसे बिना बताए एक डॉक्टर लड़के को उसके लिए रिश्ता देखने बुला लिया जाता है। जब ‘कुंदन’ ने ये बात अपने इकलौते दोस्त ‘मुरारी’ को बताई तो उसने कहा-
“ये मोहल्ले के लड़कों का प्यार अक्सर डॉक्टर और इंजीनियर ले जाते हैं”
एक तरह से सही भी तो है हमारे भारतीय समाज में आज भी प्रेम विवाह से वैसी ही दूरी बनाए जाती है जैसी दूरी आजकल हम इस कोरोना काल में एक दूसरे से बनाकर रखे हुए हैं।

कभी हमसे अनजाने में इतना बड़ा गुनाह हो जाता है कि फिर चाहे हम कितने ही धागे दरगाह पर बाँध लें या गंगा में अनगिनत डुबकियाँ लगा लें। लेकिन वो गुनाह कभी धुलता नहीं है। उसी के साथ हमारी पूरी ज़िंदगी खर्च हो जाती है।

ऐसा ही कुछ अनजाने में “कुंदन” से हो गया था। जिसकी वजह से “जसजीत सिंह शेरगिल” (अभय देओल) की जान चली जाती है। जिसे “ज़ोया” शादी करने के लिए बनारस बुलाती है। इस एक गुनाह को धोने के लिए “कुंदन” दिल्ली में ‘जसजीत’ के कॉलेज जा पहुँचता है।

यहाँ से फ़िल्म एक पॉलिटिकल मोड़ ले लेती है। जिसमें ‘कुंदन’ जैसा ज़ाहिल लड़का कॉलेज से शुरू हुई एक पार्टी का CM Candidate बन जाता है। अपनी पूरी ज़िंदगी ‘कुंदन’ सिर्फ़ ‘ज़ोया’ के प्यार के लिए जीता है और अपनी मौत को भी उसी प्यार के ख़ातिर गले लगा लेता है।

हमारी कहानी चाहे जहाँ से भी शुरू हुई हो , किसी भी छोटे बड़े शहर से उसे आख़िर में दिल्ली पहुँचना ही पड़ता है। अगर इश्क़ एक पेड़ है तो मैं कहूँगा की दिल्ली शहर उस पेड़ की जड़ें हैं। आपको एक बार दिल्ली के दरबार में जाकर हाज़िरी देनी ही पड़ेगी।

“ये बनारस है अगर लड़का यहाँ भी हार गया तो फिर जीतेगा कहाँ?
ऐसे ही बनारस की किसी गली में एक “कुंदन” फिर पैदा होगा जो बस अपनी “ज़ोया” का “राँझना” बनना चाहेगा और चाहेगा कि एक बार तो “ज़ोया” उसे इस ज़िन्दगी में प्यार से गले लगा ले।

इसी मुहब्बत की दास्ताँ के नाम “फ़ैज़ अहमद फ़ैज़” साहब का एक शेर कहना चाहूँगा।

“दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के”

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