तांडव रिव्यु : सत्ता के खेल में राजनीति कैसे मचाती है ‘तांडव’,आपके धैर्य की होगी परीक्षा

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“तांडव” का अर्थ होता है “भगवान शिव के द्वारा किया जाने वाला रौद्र नृत्य”।

इस वेब सीरीज का मुख्य आकर्षण इसकी बेहद उम्दा स्टारकास्ट है। इसमें लगभग डेढ़ दर्जन कलाकार अपने अपने किरदारों में नज़र आएंगे।

सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में सबसे बड़ी पार्टी के इलेक्शन रिजल्ट आने से पहले ही एग्जिट पोल के नतीजों के साथ कहानी शुरू होती है। देवकी नंदन(तिग्मांशु धूलिया) जो कि लगातार चौथी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। उनके बेटे समर प्रताप सिंह(सैफ अली खान) जो खुद को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि पार्टी उनकी छवि की वजह से इलेक्शन जीतने वाली है। यहीं से पार्टी में एक गृह युद्ध छिड़ जाता है। जिसे हम पूरी सीरीज के दौरान देख सकते हैं।

इसे हम यूँ समझ सकते हैं कि एक राजा है जो राजा बने रहना चाहता है। लेकिन उसका युवराज बेटा गद्दी के लिए अपने पिता को ज़हर देकर मार डालता है। लेकिन उसका राज़ उजागर होने की वजह से वो राजा नहीं बन पाता है। दरअसल वो कुछ नहीं बन पाता है। तभी वो ठान लेता है कि उसे अब “किंग” नहीं बल्कि “किंगमेकर” बनना है।

इस कहानी में कुछ भी नया नहीं है। एक बेसिक और सिंपल सी स्टोरी लाइन है। जिसमें एक बेटा प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने के लिए अपने पिता की हत्या कर देता है और फिर अपने आप को बचाने के लिए उसे कुर्सी से हाथ धोना पड़ता है। वेब सीरीज की कहानी में बहुत सारे लूप होल हैं जिनका कुछ अर्थ नहीं निकलता है। इसे इंटरेस्टिंग बनाने की कोशिश की गई लेकिन वो हो नहीं पाया। कहानी में काफी खामियाँ है या आप कह सकते हैं कि कहानी अधूरी है। ये सिर्फ एक बार देखे जाने योग्य है।

इसमें दो कहानियाँ एक साथ चल रही है। पहली नेशनल लेवल पर जिसमें एक सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर कलह छिड़ा हुआ है। जहाँ हर कोई कुर्सी को पाना चाहता है। दूसरी कहानी यूनिवर्सिटी लेवल की है। जिसमें दिखाया है कि कैसे यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट इलेक्शन में हेर फेर किया जाता है। इसमें दोनों को लिंक कर दिया गया है। पूरी कहानी मुझे लगता है कि इसके अगले सीजन पर छोड़ दी गयी है।

इस वेब सीरीज में लिखा गया है कि कहानी फिक्शनल है।लेकिन ऐसे कई सीन हैं जिन्हें आप अभी हाल ही में गुज़रे हुए देख चुके हैं।
• जैसे कि इसमें जो VNU दिखाया गया है। जिसमें स्टूडेंट्स आज़ादी के नारे लगा रहे हैं। उसे आप JNU से जुड़ा हुआ देख पाएँगे।
• इसमें दिखाया गया है कि किस तरह IT Cell वाले फर्जी ट्विटर हैशटैग ट्रेंड करते हैं। जो कि आजकल अमूमन देखने को मिल जाता है।
• दिखाया गया है कि किस तरह आन्दोलन को हिंसा का रूप दिया जाता है। पुलिस की बर्बरता, UAPA, फेक केसों में फंसाना और जो स्टूडेंट्स अपनी आवाज़ उठाते हैं उन्हें दबाना।
• इसमें दिखाया है कि एक 34 साल की महिला को रक्षा मंत्री बनाया जाना परेशानी का सवाल है। क्योंकि मर्दों को उन्हें सैल्युट करने में शर्म महसूस होगी। मेरे ख़्याल से ये pseudo feminism का पॉइंट दर्शाया गया है।

“सैफ अली खान” एक ग्रे शेड वाला किरदार निभा रहे हैं जो काफी पावरफुल है। वो अपनी पॉवर और कॉन्टेक्ट्स की बदौलत कभी भी कुछ भी उलट सकता है। सैफ अली खान अपने किरदार में काफी दमदार नज़र आये हैं। दूसरा मुझे इसमें सबसे अच्छी एक्टिंग सुनील ग्रोवर की लगी है। जिन्होंने अपना सीरियस किरदार शुरू से लेकर आख़िर तक बखूबी पकड़े रखा। मोहम्मद ज़ीशान अयुब अपने स्टूडेंट लीडर के किरदार में सराहे गए हैं। कृतिका कामरा इसमें एक स्टूडेंट नज़र आई हैं। जो कि काफी डिसेंट सी लगी है।

डिनो मोरिया एक लंबे अरसे बाद इस सीरीज के जरिये पर्दे पर वापसी कर रहे हैं। अनूप सोनी भी एक पॉलिटिशियन के रूप में ठीक लगे हैं। तिग्मांशु धूलिया, कुमुद मिश्रा और डिम्पल कपाड़िया जैसे सीनियर एक्टर्स भी इसमें अपना रंग छोड़ते दिखे हैं। नेहा हिंगे, गौहर खान, सारा जेन डियास ने भी अपने किरदार सही से अदा किए हैं।

मशूहर डायरेक्टर”अली अब्बास ज़फ़र” ने कई सुपरहिट फिल्में बनाई है। बतौर डायरेक्टर उनका काम अच्छा रहा है। जैसे कि कैमरा वर्क, बैकग्राउंड म्यूजिक काफी अच्छा है, स्क्रीनप्ले काफी एंगेजिंग है।

रेटिंग सेक्शन:-
• स्टोरी:- 3.25/5
• एक्टिंग:- 3.75/5
• डायरेक्शन:- 3.5/5
• ओवरऑल:- 3.25/5

रिलीज डेट:- 15/01/2021
प्लेटफार्म:- अमेज़न प्राइम
एपिसोड्स:-9

डायरेक्टर:- अली अब्बास जफर
कहानीकार:- गौरव सोलंकी

कलाकार:- सैफ अली खान, डिम्पल कपाड़िया, तिग्मांशु धूलिया, कुमुद मिश्रा, सुनील ग्रोवर, मोहम्मद ज़ीशान अयुब, कृतिका कामरा, सारा जेन डियास,गौहर खान, डिनो मोरिया, अमायरा दस्तूर, अनूप सोनी, नेहा हिंगे

जॉनर:- पॉलिटिकल ड्रामा

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