जाने से पहले एक आखरी बार मिलना जरूरी क्यों होता है

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04-अगस्त-2020  

यह बोलकर ऋषि कपूर कुछ देर रुकते हैं और खो जाते हैं अपने अतीत में की कैसे उसकी प्रेमिका के शहर बदल लेने पर वो उससे मिलने दिल्ली से कलकत्ता चला गया था। एक अंजान शहर में बिना कुछ सोचे हुए और एक ये है जिसने उसे आसानी से जाने दिया।

फिर वो मुस्कुराता है और सैफ़ अली खान की ओर व्यंग्य की दृष्टि से देखता है। जैसे वो सैफ़ अली खान से ही नहीं बल्कि इस पूरी जनरेशन से कह रहा हो कि ये प्यार करना तुम्हारे बस का नहीं है। तुम महज़ जिस्मों से लिपटने को ही प्यार समझ बैठे हो।

“मुझे तुमसे प्यार है” कह देने भर से ही प्यार नहीं हो जाता। प्यार निभाना पड़ता है, एक दूसरे को समझना होता है, एक दूसरे को वक़्त देना होता है। लेकिन तुम रुकना कहाँ चाहते हो, ना ही तुम समझना चाहते हो। तुम तो बस तेज़ी से आगे भागे जाना चाहते हो। दिक्कत इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास हर चीज़ के लिए ढेर सारे ऑप्शन हैं। तुम ये नहीं जानते कि प्यार बिना ऑप्शन के होता है।

कहीं ऐसा ना हो आप अपनी ‘मीरा’ को यूँहीं चला जाने दे बिना ये जाने की क्या आपको वाक़ई में उससे मुहब्बत है? क्या पता उसे भी आपसे मुहब्बत  हो? फिर कुछ सालों बाद जब आप उसको याद करते हुए “साहिर” को पढ़ रहे होंगे तो आपको लगेगा कि ये शेर आपके लिए ही बना है।

” ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया।।

साहिर ने भी मुहब्बत को क्या खूब बयाँ किया है। साहिर और अमृता प्रीतम के किस्से आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा हैं। अधूरे इश्क़ से बड़ा दर्द ज़माने में दूसरा नहीं होता।

~ सूफ़ी सोहेल

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