जब मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने इन पंक्तियों में उतार अपनी जिंदगी की कहानी…

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“मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है,
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है”

यह गीत गुज़रे ज़माने के मशहूर शायर और गीतकार “साहिर लुधियानवी” ने लिखा है। इस गीत के ज़रिए उनकी पूरी ज़िंदगी परिभाषित की जा सकती है। भले ही “साहिर” ने लिखा हो कि वो पल दो पल के शायर हैं और पल दो पल उनकी कहानी है। लेकिन वो आज भी कहीं ना कहीं हमारे बीच मौजूद हैं। जब जब इश्क़ की बात होती है तो “साहिर” के गीत और शेर गुनगुनाये जाते हैं।

“साहिर” का जन्म 8 मारवाह 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। उनका असली नाम “अब्दुल हयी साहिर” है। उनकी माता ने आपसी झगड़ों की वजह से उनके पिता को छोड़ दिया था। जिस वजह से उनका बचपन गरीबी में गुजरा। “साहिर” की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई थी।

“ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्या देखें ज़िन्दगी को किसी की नज़र से हम”

“साहिर” ने ज़िन्दगी के फ़लसफ़ा को अपनी शायरियों और गीतों में बखूबी उतारा है। उन्होंने अपने बचपन के कड़वे अनुभवों को समेटकर 24 साल की उम्र में वर्ष 1945 में लाहौर में पहली किताब छपवाई। जिसका नाम “तल्खियाँ” रखा गया। इसके बाद “साहिर” एक शायर के रूप में काफी प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने लाहौर में “अदब-ए-लतीफ़, शाहकार और सवेरा” नामक पत्रिकाओं का सम्पादन किया। बाद में मुम्बई में भी उन्होंने कुछ वर्ष तक “शाहराह और प्रितलड़ी” का सम्पादन किया। उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया था।

“अहले-दिल और भी हैं, अहले-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं, दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं”

मुझे लगता है ये शेर उन्होंने तब कहा होगा जब उनका “अमृता प्रीतम” से अलगाव हुआ होगा। वो जब लुधियाना हाई स्कूल में थे तब “अमृता” उनकी शायरियों की वजह से उनसे प्यार कर बैठी थी। पर इश्क़ के आड़े हमेशा से मज़हब और ग़रीबी आती रही है। यही यहाँ हुआ जब “साहिर” मुसलमान होने की वजह से “अमृता” के घरवालों को पसंद नहीं आये। लेकिन आज भी “अमृता और साहिर” के किस्से प्रसिद्ध हैं।

“ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पर लाता चला गया”

“साहिर लुधियानवी” को वैसे तो “रोमांटिक शायर” कहा जाता है। लेकिन उन्हें कभी ज़िन्दगी में प्यार मिल ना सका। वो हमेशा अधूरे इश्क़ के मारे रहे। अपने दूसरे प्यार “सुधा मल्होत्रा” से भी साहिर को मायूसी ही हाथ लगी। शायद इसी के बाद उन्होंने कभी शादी ना करने का फैसला लिया होगा। लेकिन उन्होंने अपनी “मां जी” से हमेशा बेतहाशा मुहब्बत की।

“कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले”

बेशक “साहिर” ने अपने गीत में ये कहा है कि कल उनसे बेहतर कहने वाले दूसरे भी आएंगे। लेकिन साल 1949 में जब उन्होंने फिल्मी गीत लिखने शुरू किए। तब से एक से बढ़कर एक गीत लिखे। जो आज भी सुने और गुनगुनाये जाते हैं। उनके लिखे गानों में एक अपनापन और संजीदगी झलकती है। उन्होंने सचिनदेव बर्मन, एन. दत्ता, शंकर जयकिशन और ख़य्याम सरीखे प्रसिद्ध संगीतकारों के लिए गीत लिखे।

“वो अफ़साना जिसे तक़मील तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा”

अपनी नाकाम मोहब्बतों का दर्द उन्होंने इस शेर में बयान किया है। उन्होंने आने वाली पीढ़ी को बताया कि अगर मुहब्बत में जीत ना सको तो उसे एक अच्छा मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए। साहिर मोहब्बत और एकाकीपन की खुद में एक पूरी किताब थे। जो वक़्त दर वक़्त दुनिया के हिसाब से खुलती रही।

“तंग आ चुके हैं कशमकशे-ज़िन्दगी से हम
ठुकरा ना दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम”

एक इंसान जब अपनी पूरी ज़िंदगी अकेले गुज़ारता है तो उसे उसका अकेलापन अन्दर ही अन्दर से कचोटने लगता है। उसे लगता है कि उसका शरीर एक दम खोखला हो चुका है। इसी अकेलेपन ने साहिर को ये शेर लिखने पर मजबूर किया होगा। उनके पास दौलत, शौहरत सब कुछ था। बस नहीं था तो कोई अपना। इसी के चलते 25 अक्टूबर 1980 को 59 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हो गया।

जिस ढंग से “साहिर” ने तमाम परेशानियाँ झेलीं और अपनी ज़िंदगी गुज़ारी। उसके लिए उनके नाम उनका ही लिखा ये शेर पढ़ना चाहूँगा।

“हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
मैं ज़िन्दगी का साथ यूँ ही निभाता चला गया”

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