गुलज़ार साहब: रूहानियत के पहले मकाँ में…

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“गुलपोश कभी इतराए कहीं,
महके तो नज़र आ जाए कहीं”

ऐसे ही एक गुलपोश के बारे में बताने जा रहा हूँ जो जहाँ भी होते हैं अपनी महक बिखेरते रहते हैं। उनका नाम है “सम्पूरण सिंह कालरा” जिन्हें हम “गुलज़ार साहब” के नाम से भी जानते हैं। आप सब लोग इन्हें बड़े अच्छे से जानते होंगे जो नहीं जानते उन्हें बताए देता हूँ कि ये वो शख़्सियत है जो पिछले 50 सालों से साहित्य की दुनिया में अपना इक़बाल बुलंद किये हुए हैं।

बात है 18 अगस्त 1934 की जब झेलम जिले के दीना गाँव में ‘माखन सिंह कालरा’ और ‘सुजान कौर” के यहाँ सिख परिवार में “सम्पूरण सिंह कालरा यानी गुलज़ार” साहब ने जन्म लिया।
बँटवारे की वजह से उन्हें अपना गाँव छोड़कर मुम्बई बसना पड़ा। इसी कारण उन्हें अपनी पढ़ाई के साथ गैराज में भी काम करना पड़ा। उन्होंने उस समय की मशहूर अभिनेत्री “राखी” से विवाह किया। इसी महीने “गुलज़ार” साहब ने अपने जीवन के 86 बरस पूरे किए हैं।

“आज हर ख़ामोशी को मिटा देने का मन है
जो भी छिपा रखा है मन में लूटा देने का मन है”

सफ़ेद कुर्ता पाजामे की पोशाक पहने और आँखों पर एक सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा लगाए, इन शख़्स ने पिछले 50-60 सालों में अपना लिखा सब कुछ अर्पण कर दिया है। उनके सम्मान में लिख पाना थोड़ा मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि जितने शब्द मेरे दिमाग की आकाशगंगा में मौजूद हैं। उससे कहीं गुणा ज्यादा शब्दों को वो कागज़ पर उतार चुके हैं। एक दिन कागज़ पर वो एक ‘तारा’ उकेरते हैं और अगले दिन उस कागज़ पर पूरा आसमान तैर रहा होता है। सबसे पहले उन्होंने”गुलज़ार दीनवी” पेन नेम से शुरुआत की जिसे बाद में महज़ “गुलज़ार” कर दिया।

गुलज़ार साहब एक राइटर, डायरेक्टर, गीतकार, पटकथा लेखक और कवि हैं। मानो जैसे भगवान ने पंचतत्व एक ही इंसान को बख़्श दिए हों। गुलज़ार साहब ने म्यूजिक डायरेक्टर सचिन देव बर्मन के साथ 1963 में फ़िल्म बंदिनी से अपने गीत लिखने के सफर की शुरुआत की। जो बदस्तूर आज तक ज़ारी है। गीत लिखने के साथ साल 1971 में गुलज़ार साहब ने बतौर निर्देशक काम शुरू किया। जिसमें उनके द्वारा निर्देशित सीरियल “मिर्ज़ा ग़ालिब” ने काफी लोकप्रियता हासिल की।

“लफ्ज़ थोड़े हैं ना मेरे पास,
बड़ी महँगी चीज़ है,
बहुत ज्यादा खर्च नहीं करता”

भले ही गुलज़ार साहब ने कहा हो कि वो लफ्ज़ खर्च नहीं करते। लेकिन उनकी लिखी कविताएं, नज़्में, त्रिवेनियाँ और ग़ज़लें आज पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। उन्होंने अपना काव्य संकलन तीन पुस्तकों में प्रकाशित किया है। जिनका नाम “चाँद पुखराज, रात पश्मीने की और पन्द्रह पाँच पचहत्तर” है। वहीं उनकी कहानियाँ “रावी पार” और “धुआँ” नाम से प्रकाशित हुई हैं।

जितनी महान गुलज़ार साहब की शख्सियत है उतनी ही लम्बी फहरिस्त उनके परुस्कारों की भी है। जहाँ उन्होंने बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड में अपना परचम लहराया। वहीं साहित्य से लेकर देश के तीसरे नागरिक सम्मान से सम्मानित हुए। गुलज़ार साहब ऐसे ही कुल 36 पुरुस्कार अपनी फहरिस्त में शामिल कर चुके हैं। जिनमें मुख्य रूप से “पद्म भूषण, ऑस्कर अवार्ड, दादा साहेब फाल्के अवार्ड और नेशनल फ़िल्म अवार्ड्स” सम्मिलित हैं।

“थोड़ा सा रफू करके देखिए न
फिर से नई सी लगेगी
ज़िन्दगी ही तो है”

बहुत ही कम शब्दों में बहुत बड़ी और गहरी बातें कह देना गुलज़ार साहब को बाकी कवियों से अलग बनाती है। अपनी ज़िंदगी में आये अनुभवों को उन्होंने बड़े ही सहज तरीके से लोगों के सामने रखा। उन शब्दों का असर बड़ा ही गहरा और महत्वपूर्ण रहा है। उन्हें ज़िन्दगी से शिकायतें भी काफी रही है। जिसे उन्होंने अपनी त्रिवेणियों और नज़्मों के सहारे बयाँ किया है।

“गुलज़ार” साहब को उनकी चन्द पंकितयाँ भेंट करना चाहूँगा।

“कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है”

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