आशिक़ी का “Move On” कांड

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मनीष पाण्डेय:
जयपुर  

एक शब्द होता है ‘move on’ इस शब्द का सबसे अधिक अगर कहीं इस्तेमाल हुआ है तो वो हुआ है इश्क के खेल में। लोग एक बार इश्क करते हैं फिर ब्रेक अप होता है और फिर move on कर जाते है। फिर दुबारा इश्क करते हैं, फिर से ब्रेकअप होता है और फिर move on कर जाते हैं। फिर इश्क करते हैं, फिर ब्रेकअप, फिर move on। यह क्रम चलता रहता है जीवन में।

सब इश्क करते हैं इस आभासी दुनिया में, हाँ मैंने भी इश्क किया उससे पहली बार, वो किसी बात पे रूठ गयी मुझसे, फिर मैंने भी दुबारा और ज्यादा प्यार किया लेकिन उसी से। वो एक बार फिर से रूठ गई किसी बात पे फिर मैंने उसे और शिद्दत से प्यार करना शुरू किया लेकिन मैंने कभी move on नहीं किया और ना कर पाऊँगा क्योंकि इश्क को मैंने इबादत समझा है।

लेकिन वो कहते है न कि किसी हो बेहद प्यार करना लूडो के खेल में लगातार तीन बार छः नंबर आने जैसा होता है। मैं तुम्हें हमेशा ऐसे ही सच्चा प्यार करता रहूँगा लेकिन कभी तुम्हारे ऊपर दबाव नहीं डालूँगा की तुम भी मुझे मेरी तरह प्यार करो।

मालूम है क्यों, क्योंकि शायद तुम्हारी नजरों में मेरी इतनी हैसियत नहीं कि तुम मुझे प्यार के काबिल समझो या फिर तुम्हें लगती होगी मेरे प्यार में कोई कमी। पर मैं नहीं करूँगा कोई शिकायत तुमसे क्योंकि भरोसा है मुझे मेरे इश्क की गहराई पे।

हाँ, इन दिनों मैंने थोड़ा-थोड़ा गाली बकना भी सीख लिया है और इसके जिम्मेदार हैं वो लोग जो कहते है कि सच्चा प्यार-व्यार कुछ नहीं होता है। और हाँ जो तुम कहती हो न कि मेरा भरोसा नहीं करना तो सुनो मैं करुँगा तुम्हारा भरोसा और खूब करूँगा, तुम्हारा दिल अगर इजाजत दे तो घोंट देना गला तुम मेरे भरोसे का वैसे ही जैसे एक दिया जला देता है अपने ही चाहने वाले को।

मैं तुम्हारे नाम से लगाये उस पेड़ के पास बैठ कर गुजार दूँगा अपनी जिंदगी बिना कुछ बोले, मौन हो जाऊँगा हमेशा के लिए बिना किसी से कुछ कहे।सुनो, मैने इश्क नहीं इबादत की है।

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