अधूरा इश्क़

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ये एक काल्पनिक कहानी है जिसे लिखा है सूफ़ी सोहेल ने” I 

 

प्यार, मोहब्बत, इश्क़ ये सब झूठ हैमैंने अपनी बात रखते हुए उससे कहा।
तुम तो प्यार में हो ना चलो तुम ही मेरे कुछ सवालों के जवाब दे दो।

अच्छा जनाब! चलिए ठीक है आज इस पर बात हो ही जाए।काव्या ने मुझे चिढाते हुए कहा।

अप्रैल की इस चिलचिलाती गर्मी में हम अपने क्लासरूम से निकलकर कॉलेज के कैंटीन में जा बैठे। अपने लिए हमने 2 कोला आर्डर की और अपनी बहस शुरू कर दी।

जी हाँ, काव्या और मैं पिछले 5 साल से एक दूसरे के काफी अच्छे दोस्त हैं। जब मैंने उर्दू और फिलोसोफी चुना तो काव्या ने भी अपने लिए वही चुन लिया। क्योंकि उसे मैथ्स में कोई दिलचस्पी नहीं थी और बायोलॉजी वो पढ़ना नहीं चाहती थी।

अच्छा क्या मुझे तुम बताओगी कि आख़िर ये प्यार होता कब है? जब प्यार होता है तो पता कैसे चलता है कि प्यार हुआ या नहीं? अपने प्यार का इज़हार कब करना होता है? क्या सामने वाले को मुझसे प्यार है? क्या खबर मैं अपने दिल की बात कहने जाऊं और हमारे दरमियाँ जो रिश्ता है वो ही खत्म हो जाये?
मैंने एक ही साँस में ये सारे सवाल उससे पूछ लिए।

पहले तो वो बहोत देर तक मेरे इन बचकाने सवालों पर हँसी, फिर बोली ज़रा आहिस्ता आहिस्ता शेख़ साहब।
प्यार तब होता है जब आप इसके लिए तैय्यार ना हो, जब आप सोच रहे हों कि आपको प्यार हो ही नहीं सकता।

अगर तुम्हें लग रहा हो की हवाएं चलने लगेंगी, तुम्हारे दिमाग में गाने चलने लगेंगे और तुम्हारे पीछे कई वायलिन बज रहे होंगे।ये महज़ फिल्मों में होता है। असल जिंदगी में प्यार बिना चेतावनी दिए आता है।

अच्छा! ये ख़्याल रखना, ये भी प्यार ही होता है क्या? मैंने दोबारा उस पर अपना सवाल दागा।
जी हुज़ूर! ख़्याल रखना ही पहली सीढ़ी होती है यहीं से प्यार की शुरुआत होती है।
काव्या ने भी एक दम सीधा जवाब दिया और अपने बैग में से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़की किताब निकाल कर टेबल पर रखी।
उसे फ़ैज़ साहबबड़े पसन्द थे और उनकी मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँगवो हमेशा गुनगुनाती रहती थी।

और हाँ, इज़हार करने का कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं किया गया है। जब तुम्हें लगे तुम किसी के लिए कुछ खास महसूस करते हो तो ये बात उसे जाकर बता दो ।

सामने वाले को तुमसे प्यार है या नहीं ये तब ही पता लग पाएगा न जब तुम उसे अपने दिल की बात कहोगे, हो सकता है उसे तुमसे प्यार हो या ये भी हो सकता है उसे तुमसे प्यार ना हो। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अब दुनिया खत्म हो गयी है और तुम्हें कभी प्यार नहीं मिलेगा।
समझ आया या अभी और कुछ पूछना बाक़ी है नौमान जी।

मतलब ये हुआ कि प्यार एक तरह से बाज़ी हुई, जो जीत गया वो जीत गया और जो हार गया वो ज़िन्दगी हार गया।
मैंने फिर उसे घेरने की कोशिश की।

मैं, यानी की नौमान शैख़जिसे उर्दू शायरी में जितनी दिलचस्पी थी उतनी ही काव्यामें भी थी। आखिर हो भी क्यों ना ।मैं उससे पिछले 5 साल से मुहब्बत जो करता था पर कभी इज़हार नहीं कर पाया।
इस दिल्ली शहर की हर खूबसूरत चीज़, हर खूबसूरत एहसास सब उसी के साथ तो जिये हैं। वो हमेशा से कहती आयी है ये शहर नहीं महफ़िल है शेख़ साहब। जी, वो मुझे शेख़ साहब ही बुलाती है और मुझे भी ये सिर्फ उसी से सुनना पसंद है।

इससे पहले वो कुछ बोलती उसका फोन बज उठा, स्क्रीन पर नाम फ़्लैश हुआ दरवेशजो कि हमारा सीनियर है और काव्या का बॉयफ्रेंड भी।
हाँ, बस 5 मिनट में आ रही हूँ।
कैंटीन में हूँ बाबा, नौमान के साथ।

मैं बस इतना ही सुन पा रहा था और उसने फोन अपनी जीन्स की पीछे वाली पॉकेट में रखा। अपना बैग उठाया और जाते हुए बोली – ” ज्यादा मतलब वतलब में मत पड़िये शैख़ साहब, इश्क़ का मतलब होता है सिर्फ इश्क़
बाकी का कल देखते हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़साहब का एक शेर याद आ रहा है

और क्या देखने को बाकी है
आपसे दिल लगा के देख लिया।।

ख़ैर, मैं उस बन्द दरवाज़े को देखता रहा और सोचता रहा कि काश मैं काव्या को बता पाता कि मुझे पता है प्यार क्या होता है, मुझे तो बस तुम्हारे साथ वक़्त गुज़ारना अच्छा लगता है, तुमसे बेहिसाब बातें करना अच्छा लगता है।

इश्क़ का मतलब होता है सिर्फ इश्क़ और मेरा वो इश्क़ तुम हो काव्या।

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