“तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया तू ने ढ़ाला है और ढ़ले हैं हम” : जावेद अख़्तर

“तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया तू ने ढ़ाला है और ढ़ले हैं हम” : जावेद अख़्तर

“तू तो मत कह हमें बुरा दुनियातू ने ढ़ाला है और ढ़ले हैं हम” इन्सान किसी के कहने या बताए रास्ते पर चलने से महान नहीं बनता है। वो महान बनता है खुद को विपरीत परिस्थितियों में ढालने और खुद के रास्ते पर चलने से। ऐसे ही एक महान शख़्स के बारे में बताने जा रहा हूँ जिन्होंने खुद को विपरीत परिस्थितियों में ढ़ाला है और आज एक ऊँचा मक़ाम हासिल किया है। उस शख़्सियत का नाम “जावेद अख़्तर” साहब है। बात है 17 जनवरी 1945 की जब ग्वालियर शहर…

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Story: “मुझे आदत है तुम्हारी और आदतें छूटती नहीं है”

Story: “मुझे आदत है तुम्हारी और आदतें छूटती नहीं है”

“तुम जानती हो मेरे पास कोई नहीं है जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूँ। अपना हाल सुना सकूँ। मैं बिल्कुल अकेला हूँ और मुझे आदत है तुम्हारी।”कुछ देर के लिए मैं एक दम चुप हो गया। फिर बोला।“आदतें छूटती नहीं हैं”दरअसल मैं फ़ोन पर रोना नहीं चाहता था। दूसरी तरफ से कोई जवाब आता इससे पहले मैंने कॉल कट कर दिया। अपने फ़ोन में वही मेरी हाल के दिनों की पसन्दीदा क़व्वाली “दिल ग़लती कर बैठा है” लगाकर फ़ोन साइड में रख दिया। फिर थोड़ा सीधा लेटकर अपने…

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कहानी: वादी-ए-कश्मीर…

कहानी: वादी-ए-कश्मीर…

“नूर, नूर, ज़रा ध्यान से बेटा, सीधा बैठो”नूर की अम्मी ने उसे अपनी और खींचते हुए कहा। जो शिकारा में झील की तरफ झुककर अपने हाथों से पानी उछाल रही थी। “क्या अम्मी, इतना मज़ा आ रहा था। मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े न हूँ”नूर ने अपनी अम्मी से शिकायत करते हुए कहा। मैं दूसरे शिकारा से ये सब देखे जा रहा था। दरअसल, मैं सिर्फ़ नूर को देखे जा रहा था। जो “डल झील” के चारों तरफ अपनी नज़रें घुमा कर उसकी खूबसूरती निहार रही थी। लेकिन मेरी नज़र…

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नए रूप का राष्ट्रवाद,जिसने अपनी राष्ट्रीय हितों को पूर्ण करने के लिए एक औपनिवेशिक व्यवस्था में तब्दील कर दिया

नए रूप का राष्ट्रवाद,जिसने अपनी राष्ट्रीय हितों को पूर्ण करने के लिए एक औपनिवेशिक व्यवस्था में तब्दील कर दिया

सोलहवीं सदी के आसपास यूरोपिय महाशक्तियां आधुनिकता के नये पृभात में पृवेश कर रही थी,जहाँ जीवन के हर आयाम में नये उच्च आदर्शों के समावेश को बल दिया गया | सामंती व्यवस्था से इतर समानता ,नैसर्गिक न्याय आदि उच्च आदर्शों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं जन्म ले चुकी थी,आर्थिक क्षेत्र में आधुनिक मशीनों के आविष्कार और उनके उपयोग जिससे मानव समाज को कष्ट दायक,मार्मिक श्रम से मुक्ति मिली अर्थात शिल्प से औधौगिक स्तर का विकास हुआ | नये रूप का राष्ट्रवाद,एक अलग तरह के राष्ट्रीय गौरव की चेतना जिसने अपनी राष्ट्रीय…

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“आम जन का निजीकरण समर्थन करना”, असल में उस डाल को काटने जैसा जिस पर स्वयं बैठे हो

“आम जन का निजीकरण समर्थन करना”, असल में उस डाल को काटने जैसा जिस पर स्वयं बैठे हो

एक मूल तथ्य है जो कम या बिना पढ़े-लिखे व्यक्ति को भी पता होता है (पता होना चाहिए) कि एक चुनी हुई सरकार और उसकी संस्थाओं का मूल दर्शन “कल्याण” है और बाकी सभी तंत्रों का मूल दर्शन “अवसरवादी मुनाफाखोरी” है। इस तरह निजीकरण से मध्यवर्ग व तनख्वाहजीवियों को अथक कठिनाइयों और गरीब व अतिगरीब को अस्तित्व के संकट का सामना करना होगा, आज नहीं तो कल। ऐसे में निजीकरण को एक मात्र विकल्प मानना बुद्धि की जड़ता की निशानी है क्योंकि बेहतर करने के विकल्प किसी भी समय सीमित…

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भारत , भारतीयता के अन्त:निहित कटु आयाम

भारत , भारतीयता के अन्त:निहित कटु आयाम

भारत , भारतवर्ष , एक भारतीय होने के क्या मायने हैं यह इतना सीधा सरल नहीं है जितनी सहजता से इसे समझाने का प्रयास किया गया है या किया जाता है | सहजत: एवं लोकप्रिय रुप में भरत के वंशजों के देश में देखने का प्रयास देश के भोगोलिक विस्तार , तत्कालीन अन्य राजवंशों के अशि्त्तव एवं महत्ता का आकलन किये गये बिना,भरत वंश के राज्य की वास्तविक महत्व एवं राजनीतिक योगदान का सही सही आकलन किये गये बिना,सीधा सरलीकरण एवं समाज गंभीरता से रहित पृयास ही कहा जा सकता…

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Blunt बातचीत विद राइटर- प्रियंवदा दीक्षित…

Blunt बातचीत विद राइटर- प्रियंवदा  दीक्षित…

१. अपने बारे में कुछ हमारे पाठकों को बताईये, लेखन की शुरुआत करने से पहले आप क्या किया करती थी I काका हाथरसी की भूमि पर जन्म और महादेवी वर्मा के शहर इलाहाबाद से शिक्षा दीक्षा प्राप्त की।  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से Bachelor in media studies कि पढ़ाई करी। लगातार असफलता देखने के बाद 2017 से लिखना आरंभ किया।  २.आपकी अभी तक कौन-कौन सी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, थोड़ा अपनी पुस्तकों के बारे में बताईये I  2019 में मेरी पहली पुस्तक तुम्हारी प्रियम प्रकाशित हुई,जिसे हिंदी ब्लू ने प्रकाशित किया,उस…

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भारतीय लोककला में साँझी का महत्व…

भारतीय लोककला में साँझी का महत्व…

लोक कलाओं की सहज अभिव्यक्ति भी कला को एक मूल प्रवित्ति सिद्ध करती है फिर यह प्रमाणित हो गया है कि किसी समाजिक, संगठित व्यवस्था में ही कला विकास के नए आयाम स्थापित कर सकती है।  लोककला दो शब्दों का मिश्रित रूप है। जहां ‘लोक’ का प्रयोग सम्पूर्ण जनसमुदाय के लिए किया जाता है जो संगठित होकर कार्य करते हैं। और ‘कला’ कल्पनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने की क्रिया है। शेली के शब्दों में ‘कला कल्पना की अभिव्यक्ति है।’ अर्थात संगठित जनसमूह द्वारा अपनी कल्पनाओं को आकार देने की…

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महरौली शहर की दास्ताँ…

महरौली शहर की दास्ताँ…

मेहर की पायल की छनक से पूरा महरौली शहर गुलज़ार था ! वो महरौली शहर की सबसे मशहूर गाने वाली थी ! दिखने में ऐसी की रातों की नींद उड़ जाए ! ख़ूबसूरती की इन्तहां थी वो ! आशिक़ों की उसे कोई कमी नहीं थी, दिन रात लोग उसकी एक-झलक पाने को बेताब रहते थे ! लेकिन ये बात उसके कई चाहनेवालों को नागवार गुज़रती थी ! लोगो ने उसे पाने के लिए हर तरह के जतन कर लिए थे, लेकिन वो थी की वो किसी के हाथ ना आई…

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Blunt बातचीत विद राइटर- आशुतोष गर्ग…

Blunt बातचीत विद राइटर- आशुतोष गर्ग…

१. अपने बारे में कुछ हमारे पाठकों को बताईये, लेखन की शुरुआत करने से पहले आप क्या किया करते थे I *मैं मूल रूप से राजस्थान का रहने वाला हूँ लेकिन पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई। स्कूली शिक्षा के बाद हिंदी में एम.ए. और पत्रकारिता तथा अनुवाद में पी.जी. डिप्लोमा किया। साथ ही एम.बी.ए. भी किया। पिता डॉ. लक्ष्मी नारायण गर्ग, प्रतिष्ठित लेखक एवं अनुवादक हैं। शायद इसलिए, अनुवाद और लेखन-कला विरासत में मिली। कविताएँ लिखने की शुरूआत स्कूल में हो गई थी। विगत 20 वर्षों से गंभीर लेखन का प्रयास जारी है। मैं…

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